पर्वत धर उंगली पर, गिरिधर कहलाए
कृष्ण-नाम-स्मरण
जब पर्वत धारा उंगली पर, कहलाये तुम गिरिधर
धर बाँसुरी अधरों पर, तब कहलाये तुम वंशीधर,
बंधी पेट पर रस्सी कसकर, बने तभी दामोदर
रंगमंच के अद्भुत नट, नटवर, नटखट, नटनागर
नंद-पुत्र होने के कारण नंदलाल, नंदनन्दन
पुत्र यशोदा के होने से तुम्हीं यशोदानन्दन
वसुदेव के वासुदेव, माता से देवकीनन्दन
सबके मन को मोहित करते, इसीलिए मनमोहन
चुरा-चुराकर खाया माखन, इससे माखनचोर जरासन्ध से भागे रण में, कहलाये रणछोड़
गोप-गोपियों के स्वामी कहलाते गोपीवल्लभ राधाजी के परमसखा राधावर, राधावल्लभ
रास रचाकर रसिकबिहारी, तुम ही हो रसराज ब्रज के स्वामी तुम ब्रजवल्लभ, ब्रजभूषण, ब्रजराज
कुंज-वनों में विचरण कर बनवारी, कुंजबिहारी पीले कपड़ों के कारण ही तुम पीताम्बरधारी
बाँकी मोहक छवि होने से तुम ही बाँकेबिहारी रथ का पहिया लिया हाथ में, तुम रथांगपाणि
अर्जुन के तुम बने सारथी, पार्थसारथी नाम काले बादल जैसा रंग है, कहलाते घनश्याम
तीन जगह से मुड़ी भंगिमा, इसीलिए त्रिभंगी मोरपिच्छ का मुकुट पहनकर बने मयूरमुकुटी
रंग साँवला होने से कहते तुमको साँवरिया मंगलकारी छल करते हो, इसीलिए तुम छलिया
गाय पालते इसीलिए तुम कहलाते गोपाल हे कान्हा, गोविंद, कन्हैया काटो सब भवजाल
Comments
Post a Comment