जाबाली महर्षि

बंधुओं एक कथा तो अद्भुत है,जिसको सुनकर सब नशा उतर जाएगा, दूसरी दूसरी साधना, उपासना का नशा उतर जाएगा,
जाबाली महर्षि का नाम तो आप सभी ने सुना होगा,जाबाली महर्षि के नाम पर जबलपुर बसा हुआ है, ये जबलपुर नर्मदा नदी के किनारे बसा हुआ है, ये जाबाली महर्षि की तपोस्थली है, ये जाबाली महर्षि बड़े ही अनुरागी ऋषि है,जाबाली महर्षि के सम्बन्ध में उपनिषद में आया है, श्रुति भगवती कह रही है, शुकदेव जी मुक्त हुए,जाबाली मुक्त हुए, मुक्त आत्माओं में शुकदेव जी और जाबाली का नाम लिया गया, ये अपने समय के उच्च कोटि के ब्रम्ह ज्ञानी थे,जाबाली महर्षि के मन में एक दिन आया,कि मैं ज्ञान की सर्वोच्च कक्षा में प्रतिष्ठित हूं, मैं विशुद्ध चैतन्य आत्मा हूं, ये बोध उनको हो गया,उस समय श्री ठाकुर जी के मन में आया कि ये इतना बड़ा ब्रम्ह ज्ञानी हो गया है,इसको तो मैं गोपी बना कर ही मानूंगा, श्री ठाकुर जी ने लीला रची,एक दिन जाबाली महर्षि विचरण करते हुए,मेरु पर्वत की शरण में पहुंचे, तो उन्होंने देखा एक सुंदर, सुभद्र वेदी पर कृष्ण मृग चर्म धारण किए हुए,एक अतीव सुन्दरी तपस्या कर रही है,जिसकी तप कान्ति से सम्पूर्ण वन उद्भाषित हो रहा है, वो समझ गए, वह कोई सामान्य स्त्री नहीं है, ये तो कोई दिव्य देवी प्रतीत होती है,इतने कठोर तप में प्रवृत्त है, इनकी तप की अंग कान्ति से पूरा पर्वत जगमगा रहा है,जाबाली महर्षि उस दिव्य देवी के निकट गए, और बड़े ही मधुर शब्दों में बोले, देवी आपका परिचय क्या है, इतनी कठोर तपस्या करने का कारण क्या है, केवल और केवल वायु का आहार करके आप तपस्या कर रही है,तब उस देवी ने कहा,हे महर्षि जाबाली, मैं पूर्तिमति ब्रम्ह विद्या हूं,जिसको बड़े बड़े सिद्ध योगी,महामुनि,खोज रहे हैं,कि मुझे ब्रम्ह विद्या मिल जाए तो मैं कृतार्थ हो जाऊं,तब महर्षि जाबाली ने कहा आपकी कृपा से मैं आत्माराम,आत्म काम, पूर्ण काम,परम निष्काम हो गया हूं, देवी आप तो साक्षात ब्रह्म विद्या हो, फिर आप में कौन सी ऐसी कामना रह गयी, जिस कामना के लिए ये कठोर तप कर रही है, देवी बोली, मैं भले ही ब्रह्म विद्या हूं, लेकिन मेरी समझ में आ गया है, ये मेरा जीवन व्यर्थ है, श्री कृष्ण ब्रज में अवतार लेने वाले हैं, तो मेरा विचार है, श्री ठाकुर अवतार ले, तो मैं ब्रज की गोपी बनूं, और उसको अपनी गोद में बिठाकर,उनको माखन जिमाऊं, तो मैं ब्रज में गोपी बनने के लिए तप कर रही हूं, इतना सुनते ही महर्षि जाबाली का सारा का सारा नशा उतर गया, और मन में विचार किया कि जिस ब्रम्ह देवी की कृपा से मैं इस अवस्था में पहुंचा हूं, और वो स्वयं गोपी बनना चाहती हैं,तब उस देवी से महर्षि जाबाली ने प्रार्थना किया,कि हे देवी, हमें भी कोई ऐसा मार्ग बता दो, हमें भी गोपी ही बनना है,तब ब्रह्म विद्या ने महर्षि जाबाली को कृष्ण मंत्र का उपदेश दिया, उसके बाद महर्षि जाबाली ने नौ कल्प तक एक पैर पर खड़े होकर कठोर तप किया,और ब्रज में विहार करने वाले श्री भगवान कृष्ण का ध्यान किया, तो भगवान की कृपा से नौ कल्प के बाद चण्ड नाम के गोपी के घर में महर्षि जाबाली चित्रगंधा नाम की गोपी के रुप में प्रगट हुए, इन्हीं चित्रगंधा नाम की गोपी के यहां भगवान श्री कृष्ण ने माखन चोरी की लीला को किया!

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