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सीता का पूर्व जन्म

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वेदवती की कहानी रामायण के उत्तर कांड में वर्णित है। वे माँ सीता का पूर्व जन्म मानी जाती हैं। उनकी कहानी त्याग, तपस्या और प्रतिशोध की एक अद्भुत गाथा है। 1. जन्म और पृष्ठभूमि वेदवती ब्रह्मर्षि कुशध्वज की पुत्री थीं। उनका नाम 'वेदवती' इसलिए पड़ा क्योंकि वे जन्म के समय ही वेदों का पाठ कर रही थीं। उनके पिता चाहते थे कि उनकी पुत्री का विवाह केवल भगवान विष्णु से हो, क्योंकि वे उन्हें ही साक्षात लक्ष्मी का रूप मानते थे। 2. कठोर तपस्या वेदवती के पिता की हत्या एक दैत्य (शंभु) ने कर दी थी। अपने पिता की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए, वेदवती ने सांसारिक मोह त्याग दिया और भगवान विष्णु को पति रूप में पाने के लिए हिमालय में घोर तपस्या करने लगीं। वे जटाधारी बन गईं और केवल तप में लीन रहने लगीं। 3. रावण से सामना एक दिन लंकापति रावण वहां से गुजर रहा था। तपस्या में लीन वेदवती के अनुपम सौंदर्य को देखकर वह उन पर मोहित हो गया। रावण ने उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा और उनके तप का उपहास उड़ाया। जब वेदवती ने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया, तो अहंकारी रावण ने बलपूर्वक उनके बाल पकड़ लिए और उनके साथ...

64 योगिनीयाँ

🙏श्री रुद्रयामले उत्तरतन्त्र महातन्त्रोद्दीपन के षट् चक्र प्रकाश सिद्धि मन्त्र प्रकरण के अन्तर्गत भैरव भैरवी संवाद भेदिन्यादिस्तोत्रं नाम एकत्रिंशः (ईकत्तीसवे ) पटल के अलावा चौसठ योगिनी का उल्लेख पुराणों भी मिलता है , जिनकी अलग अलग उत्पत्तियाँ मानी गई है . . . 🙏इनको माँ आदिशक्ति काली का अवतार बताया है ।  🙏बताया जाता है किं घोर नामक दैत्य के साथ युद्ध करते हुए माता रानी ने ये 64अवतार लिए थे ।  🙏यह भी माना जाता है कि ये समस्त 64 योगिनिया  माता पर्वती की सखियां हैं । 🫵ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार ये 64 योगिनीयाँ श्रीकृष्ण की नासिका रध्रं से प्रकट हुईं हैं 👍चौसठ योगिनियों की पूजा करने से समस्त देवियों की पूजा हो जाती है ।  💥इन चौंसठ देवियों में दस महाविद्याओं और सिद्ध विद्याओं की भी गणना की जाती है ।  🙏ये सभी आद्या शक्ति काली के ही भिन्न-भिन्न अवतार रूप ही हैं ।  👉कुछ तांत्रिक विद्वानो का मत हैं कि समस्त योगिनियों का संबंध मुख्यतः काली कुल से हैं और ये सभी तंत्र तथा योग विद्या से घनिष्ठ सम्बन्ध रखती हैं । 🙏इनकी पूजा वामाचार और दक्षिणाचार दोनों प्रकार...

बृहस्पतिवार व्रत उद्यापन विधि एवं नियम

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बृहस्पति - गुरुवार- व्रत कथा, पूजा और उद्यापन विधि बृहस्पतिवार के दिन श्री हरी विष्णु की पूजा की जाती है। माना जाता है इस दिन श्रद्धापूर्वक श्री हरी का व्रत और पूजन करने से इच्छित फल की प्राप्ति होती है। इसके अलावा जल्द शादी करने की इच्छा रखे वालो के लिए भी ये व्रत बहतु लाभदायक होता है। अग्निपुराणानुसार अनुराधा नक्षत्र युक्त गुरुवार से प्रारंभ करके सात गुरुवार तक नियमित रूप से व्रत करने से बृहस्पति ग्रह की पीड़ा से मुक्ति मिलती है। इसके अलावा घर में सुख शांति और श्री विष्णु भगवान् का आशीर्वाद भी मिलता है। लेकिन केवल पूजन करने और व्रत रखने से सम्पूर्ण फल नहीं मिलते। पूर्ण फल के लिये बृहस्पति देव की विधि और भाव से पूजा करना भी आवश्यक है। व्रती की सुविधा के लिये हम श्री बृहस्पति देव की पूजा और उद्यापन विधि क्रम से बता रहे है आशा है आप इससे लाभान्वित होंगे। बृहस्पतिवार व्रत उद्यापन विधि एवं नियम गुरुवार के दिन भगवान विष्णु जी एवं बृहस्पति देव दोनों की पूजा होती है जिससे घर में सुख समृद्धि बनी रहती है, कुवारी लडकियां इस व्रत को इसलिए करती हैं जिससे की उनके विवाह में आने वाली रुका...

कृष्णावतार में किस देवता ने लिया कौन-सा अवतार?

कृष्णावतार में किस देवता ने लिया कौन-सा अवतार? श्रीकृष्णावतार से पहले जब भगवान ने देवताओं से पृथ्वी पर अवतीर्ण होने के लिए कहा, तब देवताओं ने कहा -‘भगवन्! हम देवता होकर पृथ्वी पर जन्म लें, यह हमारे लिए बड़ी निंदा की बात है; परन्तु आपकी आज्ञा है, इसलिए हमें वहां जन्म लेना ही पड़ेगा फिर भी इतनी प्रार्थना है कि हमें गोप और स्त्री के रूप में वहां उत्पन्न न करें जिससे आपके अंग-स्पर्श से वंचित रहना पड़ता हो। ऐसा मनुष्य बन कर हममें से कोई भी शरीर धारण नहीं करेगा; हमें सदा आप अपने अंगों के स्पर्श का अवसर दें, तभी हम अवतार ग्रहण करेंगे।’ देवताओं की बात सुनकर भगवान ने कहा – ‘देवताओं! मैं तुम्हारे वचनों को पूरा करने के लिए तुम्हें अपने अंग-स्पर्श का अवसर अवश्य दूंगा।’ यह प्रसंग अथर्ववेद के श्रीकृष्णोपनिषत् से उल्लखित है। श्रीकृष्ण के परिकर के रूप में किस देवता ने क्या भूमिका निभाई – ▪️ भगवान विष्णु का परमानन्दमय अंश ही नन्दरायजी के रूप में प्रकट हुआ। ▪️ साक्षात् मुक्ति देवी नन्दरानी यशोदा के रूप में अवतरित हुईं। ▪️ भगवान की ब्रह्मविद्यामयी वैष्णवी माया देवकी के रूप में प्रकट हुई हैं और वेद ही वसु...

राधा कुंड की मान्यता और इसकी कथा

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"राधा कुंड की मान्यता और इसकी कथा" "अहोई अष्टमी पर राधा कुंड में स्नान से होती है संतान की प्राप्ति" भगवान श्री कृष्ण की नगरी मथुरा में गोवर्धन गिरधारी की परिक्रमा के मार्ग में एक चमत्कारी कुंड पड़ता है जिसे राधा कुंड के नाम से जाना जाता है। इस कुंड के बारे में मान्यता है कि नि:संतान दंपत्ति कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी की मध्य रात्रि को यहां दंपत्ति एक साथ स्नान करते हैं तो उन्हें संतान की प्राप्ति हो जाती है। अहोई अष्टमी का यह पर्व यहां पर प्राचीनकाल से मनाया जाता है। इस दिन पति और पत्नी दोनों ही निर्जला व्रत रखते हैं और मध्य रात्रि में राधाकुंड में डूबकी लगाते हैं तो ऐसा करने पर उस दंपत्ति के घर में बच्चे की किलकारियां शीघ्र ही गूंज उठती है। इतना ही नहीं जिन दंपत्तियों की संतान की मनोकामना पूर्ण हो जाती है वह भी अहोई अष्टमी के दिन अपनी संतान के साथ यहां राधा रानी की शरण में हाजरी लगाने आता है। माना जाता है कि यह प्रथा द्वापर युग से चली आ रही है। "राधा कुंड की कथा" इस प्रथा से जुड़ी एक कथा का पुराणों में भी वर्णन मिलता है जो इस प्रकार है - जि...

भगवान विष्णु के चरणों का महत्व

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🪷🪷भगवान विष्णु के चरणों का महत्व🪷🪷      〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️                     🪔🪔🪔            किसी ने सही ही कहा है कि भगवान के पांव में स्वर्ग होता है। उनके चरणों जैसी पवित्र जगह और कोई नहीं है। इसलिए तो लोग भगवान के चरणों का स्पर्श पाकर अपने जीवन को सफल बनाने की होड़ में लगे रहते हैं।लेकिन भगवान के चरणों का इतना महत्व क्यों है क्या कभी आपने जाना है? *भगवान के चरणरज की ऐसी महिमा है कि यदि इस मानव शरीर में त्रिभुवन के स्वामी भगवान विष्णु के चरणारविन्दों की धूलि लिपटी हो तो इसमें अगरू, चंदन या अन्य कोई सुगन्ध लगाने की जरूरत नहीं, भगवान के भक्तों की कीर्तिरूपी सुगन्ध तो स्वयं ही सर्वत्र फैल जाती है।* *संसार के पालहार व परम दयालु भगवान विष्णु सबमें व्याप्त हैं। शेषनाग की शय्या पर शयन कपने वाले व शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करने वाले भगवान विष्णु के चरण-कमल भूदेवी (भूमि) और श्रीदेवी (लक्ष्मी) के हृदय-मंदिर में हमेशा विराजित रहते हैं। भगवान के चरणों से निकली गंगा का जल दिन-रात...

जाबाली महर्षि

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बंधुओं एक कथा तो अद्भुत है,जिसको सुनकर सब नशा उतर जाएगा, दूसरी दूसरी साधना, उपासना का नशा उतर जाएगा, जाबाली महर्षि का नाम तो आप सभी ने सुना होगा,जाबाली महर्षि के नाम पर जबलपुर बसा हुआ है, ये जबलपुर नर्मदा नदी के किनारे बसा हुआ है, ये जाबाली महर्षि की तपोस्थली है, ये जाबाली महर्षि बड़े ही अनुरागी ऋषि है,जाबाली महर्षि के सम्बन्ध में उपनिषद में आया है, श्रुति भगवती कह रही है, शुकदेव जी मुक्त हुए,जाबाली मुक्त हुए, मुक्त आत्माओं में शुकदेव जी और जाबाली का नाम लिया गया, ये अपने समय के उच्च कोटि के ब्रम्ह ज्ञानी थे,जाबाली महर्षि के मन में एक दिन आया,कि मैं ज्ञान की सर्वोच्च कक्षा में प्रतिष्ठित हूं, मैं विशुद्ध चैतन्य आत्मा हूं, ये बोध उनको हो गया,उस समय श्री ठाकुर जी के मन में आया कि ये इतना बड़ा ब्रम्ह ज्ञानी हो गया है,इसको तो मैं गोपी बना कर ही मानूंगा, श्री ठाकुर जी ने लीला रची,एक दिन जाबाली महर्षि विचरण करते हुए,मेरु पर्वत की शरण में पहुंचे, तो उन्होंने देखा एक सुंदर, सुभद्र वेदी पर कृष्ण मृग चर्म धारण किए हुए,एक अतीव सुन्दरी तपस्या कर रही है,जिसकी तप कान्ति से सम्पूर्ण वन उद...