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बृहस्पतिवार व्रत उद्यापन विधि एवं नियम

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बृहस्पति - गुरुवार- व्रत कथा, पूजा और उद्यापन विधि बृहस्पतिवार के दिन श्री हरी विष्णु की पूजा की जाती है। माना जाता है इस दिन श्रद्धापूर्वक श्री हरी का व्रत और पूजन करने से इच्छित फल की प्राप्ति होती है। इसके अलावा जल्द शादी करने की इच्छा रखे वालो के लिए भी ये व्रत बहतु लाभदायक होता है। अग्निपुराणानुसार अनुराधा नक्षत्र युक्त गुरुवार से प्रारंभ करके सात गुरुवार तक नियमित रूप से व्रत करने से बृहस्पति ग्रह की पीड़ा से मुक्ति मिलती है। इसके अलावा घर में सुख शांति और श्री विष्णु भगवान् का आशीर्वाद भी मिलता है। लेकिन केवल पूजन करने और व्रत रखने से सम्पूर्ण फल नहीं मिलते। पूर्ण फल के लिये बृहस्पति देव की विधि और भाव से पूजा करना भी आवश्यक है। व्रती की सुविधा के लिये हम श्री बृहस्पति देव की पूजा और उद्यापन विधि क्रम से बता रहे है आशा है आप इससे लाभान्वित होंगे। बृहस्पतिवार व्रत उद्यापन विधि एवं नियम गुरुवार के दिन भगवान विष्णु जी एवं बृहस्पति देव दोनों की पूजा होती है जिससे घर में सुख समृद्धि बनी रहती है, कुवारी लडकियां इस व्रत को इसलिए करती हैं जिससे की उनके विवाह में आने वाली रुका...

कृष्णावतार में किस देवता ने लिया कौन-सा अवतार?

कृष्णावतार में किस देवता ने लिया कौन-सा अवतार? श्रीकृष्णावतार से पहले जब भगवान ने देवताओं से पृथ्वी पर अवतीर्ण होने के लिए कहा, तब देवताओं ने कहा -‘भगवन्! हम देवता होकर पृथ्वी पर जन्म लें, यह हमारे लिए बड़ी निंदा की बात है; परन्तु आपकी आज्ञा है, इसलिए हमें वहां जन्म लेना ही पड़ेगा फिर भी इतनी प्रार्थना है कि हमें गोप और स्त्री के रूप में वहां उत्पन्न न करें जिससे आपके अंग-स्पर्श से वंचित रहना पड़ता हो। ऐसा मनुष्य बन कर हममें से कोई भी शरीर धारण नहीं करेगा; हमें सदा आप अपने अंगों के स्पर्श का अवसर दें, तभी हम अवतार ग्रहण करेंगे।’ देवताओं की बात सुनकर भगवान ने कहा – ‘देवताओं! मैं तुम्हारे वचनों को पूरा करने के लिए तुम्हें अपने अंग-स्पर्श का अवसर अवश्य दूंगा।’ यह प्रसंग अथर्ववेद के श्रीकृष्णोपनिषत् से उल्लखित है। श्रीकृष्ण के परिकर के रूप में किस देवता ने क्या भूमिका निभाई – ▪️ भगवान विष्णु का परमानन्दमय अंश ही नन्दरायजी के रूप में प्रकट हुआ। ▪️ साक्षात् मुक्ति देवी नन्दरानी यशोदा के रूप में अवतरित हुईं। ▪️ भगवान की ब्रह्मविद्यामयी वैष्णवी माया देवकी के रूप में प्रकट हुई हैं और वेद ही वसु...

राधा कुंड की मान्यता और इसकी कथा

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"राधा कुंड की मान्यता और इसकी कथा" "अहोई अष्टमी पर राधा कुंड में स्नान से होती है संतान की प्राप्ति" भगवान श्री कृष्ण की नगरी मथुरा में गोवर्धन गिरधारी की परिक्रमा के मार्ग में एक चमत्कारी कुंड पड़ता है जिसे राधा कुंड के नाम से जाना जाता है। इस कुंड के बारे में मान्यता है कि नि:संतान दंपत्ति कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी की मध्य रात्रि को यहां दंपत्ति एक साथ स्नान करते हैं तो उन्हें संतान की प्राप्ति हो जाती है। अहोई अष्टमी का यह पर्व यहां पर प्राचीनकाल से मनाया जाता है। इस दिन पति और पत्नी दोनों ही निर्जला व्रत रखते हैं और मध्य रात्रि में राधाकुंड में डूबकी लगाते हैं तो ऐसा करने पर उस दंपत्ति के घर में बच्चे की किलकारियां शीघ्र ही गूंज उठती है। इतना ही नहीं जिन दंपत्तियों की संतान की मनोकामना पूर्ण हो जाती है वह भी अहोई अष्टमी के दिन अपनी संतान के साथ यहां राधा रानी की शरण में हाजरी लगाने आता है। माना जाता है कि यह प्रथा द्वापर युग से चली आ रही है। "राधा कुंड की कथा" इस प्रथा से जुड़ी एक कथा का पुराणों में भी वर्णन मिलता है जो इस प्रकार है - जि...

भगवान विष्णु के चरणों का महत्व

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🪷🪷भगवान विष्णु के चरणों का महत्व🪷🪷      〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️                     🪔🪔🪔            किसी ने सही ही कहा है कि भगवान के पांव में स्वर्ग होता है। उनके चरणों जैसी पवित्र जगह और कोई नहीं है। इसलिए तो लोग भगवान के चरणों का स्पर्श पाकर अपने जीवन को सफल बनाने की होड़ में लगे रहते हैं।लेकिन भगवान के चरणों का इतना महत्व क्यों है क्या कभी आपने जाना है? *भगवान के चरणरज की ऐसी महिमा है कि यदि इस मानव शरीर में त्रिभुवन के स्वामी भगवान विष्णु के चरणारविन्दों की धूलि लिपटी हो तो इसमें अगरू, चंदन या अन्य कोई सुगन्ध लगाने की जरूरत नहीं, भगवान के भक्तों की कीर्तिरूपी सुगन्ध तो स्वयं ही सर्वत्र फैल जाती है।* *संसार के पालहार व परम दयालु भगवान विष्णु सबमें व्याप्त हैं। शेषनाग की शय्या पर शयन कपने वाले व शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करने वाले भगवान विष्णु के चरण-कमल भूदेवी (भूमि) और श्रीदेवी (लक्ष्मी) के हृदय-मंदिर में हमेशा विराजित रहते हैं। भगवान के चरणों से निकली गंगा का जल दिन-रात...

जाबाली महर्षि

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बंधुओं एक कथा तो अद्भुत है,जिसको सुनकर सब नशा उतर जाएगा, दूसरी दूसरी साधना, उपासना का नशा उतर जाएगा, जाबाली महर्षि का नाम तो आप सभी ने सुना होगा,जाबाली महर्षि के नाम पर जबलपुर बसा हुआ है, ये जबलपुर नर्मदा नदी के किनारे बसा हुआ है, ये जाबाली महर्षि की तपोस्थली है, ये जाबाली महर्षि बड़े ही अनुरागी ऋषि है,जाबाली महर्षि के सम्बन्ध में उपनिषद में आया है, श्रुति भगवती कह रही है, शुकदेव जी मुक्त हुए,जाबाली मुक्त हुए, मुक्त आत्माओं में शुकदेव जी और जाबाली का नाम लिया गया, ये अपने समय के उच्च कोटि के ब्रम्ह ज्ञानी थे,जाबाली महर्षि के मन में एक दिन आया,कि मैं ज्ञान की सर्वोच्च कक्षा में प्रतिष्ठित हूं, मैं विशुद्ध चैतन्य आत्मा हूं, ये बोध उनको हो गया,उस समय श्री ठाकुर जी के मन में आया कि ये इतना बड़ा ब्रम्ह ज्ञानी हो गया है,इसको तो मैं गोपी बना कर ही मानूंगा, श्री ठाकुर जी ने लीला रची,एक दिन जाबाली महर्षि विचरण करते हुए,मेरु पर्वत की शरण में पहुंचे, तो उन्होंने देखा एक सुंदर, सुभद्र वेदी पर कृष्ण मृग चर्म धारण किए हुए,एक अतीव सुन्दरी तपस्या कर रही है,जिसकी तप कान्ति से सम्पूर्ण वन उद...

श्री तुलसी देवी कवचम्

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श्री तुलसी देवी कवचम् -१ - हिन्दी अर्थ सहित   ब्रह्माण्डपुराणोक्तम्  🌷2⃣🌷 श्री तुलसी कवचम् (२) हिन्दी अर्थ सहित) 🌷🌷 🟨💠🟨💠🟨💠🟨💠🟨💠🟨💠🟨💠🟨💠🟨 🙏🏻🕯🙏🏻 🌷1⃣🌷 श्री तुलसी देवी कवचम् -१ - हिन्दी अर्थ सहित 🌷  🪔🪔🪔🪔🪔🪔 ब्रह्माण्डपुराणोक्तम् 🪔🪔🪔🪔🪔 🍁 अस्य श्री तुलसी कवच स्तोत्रमन्त्रस्य। श्री महादेव ऋषिः। अनुष्टुप्छन्दः। श्री तुलसी देवता। मन ईप्सितकामनासिद्ध्यर्थं जपे विनियोगः। अर्थ: इस तुलसी कवच मंत्र के ऋषि भगवान महादेव हैं, छंद अनुष्टुप् है, और देवता स्वयं तुलसी देवी हैं। इसका जप मनोकामना सिद्धि के लिए किया जाता है। 🍁 तुलसी श्रीमहादेवि नमः पंकजधारिणी। शिरो मे तुलसी पातु भालं पातु यशस्विनी॥ १॥ अर्थ: पद्मधारिणी श्रीमहादेवी तुलसी मेरी रक्षा करें। मेरा सिर तुलसी माता सुरक्षित रखें, और ललाट की रक्षा यशस्विनी तुलसी करें। 🍁 दृशौ मे पद्मनयना श्रीसखी श्रवणे मम। घ्राणं पातु सुगंधा मे मुखं च सुमुखी मम॥ २॥ अर्थ: पद्मनयनी (कमल समान नेत्रोंवाली) तुलसी मेरी आँखों की रक्षा करें। श्रीकृष्ण की सखी तुलसी मेरे कानों की रक्षा करें, सुगंधमयी तुलसी मेरी ...

काशी को जलाकर भस्म करने वाला वो रहस्य

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🔥*काशी को जलाकर भस्म करने वाला वो रहस्य! जब श्री कृष्णˈ के सुदर्शन चक्र ने लिया था भयानक प्रतिशोध ?*🔥 🕉️देवों के देव महादेव की नगर काशी को हिंदू धर्म में आस्था का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है. *मान्यता है कि इस पावन नगरी को स्वयं भगवान शिव ने बनाया था और यह नगरी भगवान शिव के त्रिशूल पर थमी हुई है.* भगवान शिव इस नगरी में काशी विश्वनाथ के रुप में आज भी विराजमान है जिनके दर्शन के लिए देश और दुनिया से भक्त खींचे चले आते हैं. लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि भगवान शिव की इस नगरी को एक बार भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से जलाकर राख कर दिया था.🕉️ ⁉️आखिर श्रीकृष्ण का सुदर्शन चक्र जिससे इस नगरी को जलाकर भस्म क्यों कर दिया, इसके पीछे द्वापर युग की एक कथा बेहद प्रचलित है.⁉️ 🤹*जरासंध ने अपनी बेटियों की शादी कराई थी कंस से*पौराणिक कथा के अनुसार द्वापर युग में मगध पर राजा जरासंध का राज हुआ करता था उनके आतंक के चलते उनकी पूरी प्रजा डर के साये में जीने को मजबूर थी. राजा जरासंध की क्रूरता और उसकी विशाल सेना से आसपास के ज्यादातर राजा खौफ खाते थे. यही वजह है कि ...