श्री तुलसी देवी कवचम्
श्री तुलसी देवी कवचम् -१ - हिन्दी अर्थ सहित
ब्रह्माण्डपुराणोक्तम्
🌷2⃣🌷 श्री तुलसी कवचम् (२) हिन्दी अर्थ सहित) 🌷🌷
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🌷1⃣🌷 श्री तुलसी देवी कवचम् -१ - हिन्दी अर्थ सहित 🌷
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अस्य श्री तुलसी कवच स्तोत्रमन्त्रस्य। श्री महादेव ऋषिः। अनुष्टुप्छन्दः। श्री तुलसी देवता। मन ईप्सितकामनासिद्ध्यर्थं जपे विनियोगः।
अर्थ:
इस तुलसी कवच मंत्र के ऋषि भगवान महादेव हैं, छंद अनुष्टुप् है, और देवता स्वयं तुलसी देवी हैं।
इसका जप मनोकामना सिद्धि के लिए किया जाता है।
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तुलसी श्रीमहादेवि नमः पंकजधारिणी।
शिरो मे तुलसी पातु भालं पातु यशस्विनी॥ १॥
अर्थ:
पद्मधारिणी श्रीमहादेवी तुलसी मेरी रक्षा करें।
मेरा सिर तुलसी माता सुरक्षित रखें, और ललाट की रक्षा यशस्विनी तुलसी करें।
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दृशौ मे पद्मनयना श्रीसखी श्रवणे मम।
घ्राणं पातु सुगंधा मे मुखं च सुमुखी मम॥ २॥
अर्थ:
पद्मनयनी (कमल समान नेत्रोंवाली) तुलसी मेरी आँखों की रक्षा करें।
श्रीकृष्ण की सखी तुलसी मेरे कानों की रक्षा करें,
सुगंधमयी तुलसी मेरी घ्राणेन्द्रिय (नाक) की रक्षा करें,
और सुमुखी तुलसी मेरे मुख की रक्षा करें।
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जिह्वां मे पातु शुभदा कंठं विद्यामयी मम।
स्कंधौ कह्वारिणी पातु हृदयं विष्णुवल्लभा॥ ३॥
अर्थ:
शुभ फल देनेवाली तुलसी मेरी जिह्वा की रक्षा करें।
विद्यामयी तुलसी मेरा कंठ सुरक्षित रखें।
गंगा समान पवित्र तुलसी मेरे दोनों स्कंधों (कंधों) की रक्षा करें,
और भगवान विष्णु की प्रिया तुलसी मेरे हृदय की रक्षा करें।
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पुण्यदा मे पातु मध्यं नाभिं सौभाग्यदायिनी।
कटिं कुंडलिनी पातु ऊरू नारदवंदिता॥ ४॥
अर्थ:
पुण्य प्रदान करनेवाली तुलसी मेरा उदर भाग (मध्य शरीर) सुरक्षित रखें।
सौभाग्यदायिनी मेरी नाभि की रक्षा करें।
कुंडलिनीस्वरूपा तुलसी मेरी कटि की रक्षा करें,
और नारद मुनि द्वारा वंदित तुलसी मेरे दोनों जंघों (ऊरुओं) की रक्षा करें।
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जननी जानुनी पातु जंघे सकलवंदिता।
नारायणप्रिया पादौ सर्वाङ्गं सर्वरक्षिणी॥ ५॥
अर्थ:
जननी तुलसी मेरे घुटनों की रक्षा करें,
सभी द्वारा वंदित देवी मेरी जंघाओं की रक्षा करें,
नारायण की प्रिय तुलसी मेरे चरणों की रक्षा करें,
और वे सर्वांग-संरक्षिणी मेरे समस्त शरीर की रक्षा करें।
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सङ्कटे विषमे दुर्गे भये वादे महाहवे।
नित्यं हि संध्ययोः पातु तुलसी सर्वतः सदा॥ ६॥
अर्थ:
संकट में, विपत्ति में, युद्ध या विवाद में,
प्रत्येक संध्या (प्रातः-सायं) तुलसी देवी मेरी हर दिशा से रक्षा करे
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इतीदं परमं गुह्यं तुलस्याः कवचामृतम्।
मर्त्यानाममृतार्थाय भीतानामभयाय च॥ ७॥
अर्थ:
यह तुलसी का यह कवच अत्यंत गूढ़ और अमृततुल्य है।
यह मनुष्यों को अमरता का वरदान देनेवाला और भयभीत जनों को निर्भय करनेवाला है।
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मोक्षाय च मुमुक्षूणां ध्यायिनां ध्यानयोगकृत्।
वशाय वश्यकामानां विद्यायै वेदवादिनाम्॥ ८॥
अर्थ:
यह कवच मुक्ति चाहनेवालों को मोक्ष देता है,
ध्यानयोगी जनों को ध्यान में स्थिरता देता है,
वश्यकामना करनेवालों को वश सिद्धि देता है,
और वेदपारंगत ब्राह्मणों को ज्ञान की वृद्धि प्रदान करता है।
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द्रविणाय दरिद्राणां पापिनां पापशांतये।
रोगिणां सर्वरोगहरायै आरोग्य प्रदायै॥ ९॥
अर्थ:
यह कवच दरिद्रों को धन देता है,
पापियों के पापों को शांत करता है,
रोगियों के रोगों का नाश करता है और आरोग्य (स्वास्थ्य) प्रदान करता है।
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अन्नाय क्षुधितानां च स्वर्गाय स्वर्गमिच्छताम्।
पशुव्यं पशुकामानां पुत्रदं पुत्रकांक्षिणाम्॥ १०॥
अर्थ:
यह कवच भूखों को अन्न देता है,
स्वर्ग की इच्छा रखनेवालों को स्वर्ग दिलाता है,
पशुधन चाहनेवालों को पशु देता है,
और पुत्र की कामना करनेवालों को पुत्र प्राप्त कराता है।
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राज्याय भ्रष्टराज्यानामशान्तानां च शान्तये।
भक्त्यर्थं विष्णुभक्तानां विष्णौ सर्वान्तरात्मनि॥ ११॥
अर्थ:
यह कवच जिनका राज्य चला गया है उन्हें पुनः राज्य देता है,
अशांत व्यक्तियों को शांति प्रदान करता है,
और विष्णुभक्तों की भक्ति को दृढ़ करता है।
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जाप्यं त्रिवर्गसिद्ध्यर्थं गृहस्थेन विशेषतः।
उद्यन्तं चण्डकिरणमुपस्थाय कृतांजलिः॥ १२॥
अर्थ:
यह कवच गृहस्थ को धर्म, अर्थ और काम — इन त्रिवर्ग की सिद्धि देता है।
सूर्य के उदय के समय, हाथ जोड़कर तुलसी के समक्ष इसका जप करना चाहिए।
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तुलसीकानने तिष्ठन्नासीनो वा जपेदिदम्।
सर्वान्कामानवाप्नोति तथैव मम संनिधिम्॥ १३॥
अर्थ:
जो व्यक्ति तुलसी वन में बैठकर या खड़े होकर इसका जप करता है,
वह अपने सभी मनोरथों को प्राप्त करता है
और तुलसी देवी की प्रत्यक्ष उपस्थिति का अनुभव करता है।
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मम प्रियकरं नित्यं हरिभक्तिविवर्धनम्।
या स्यान्मृतप्रजा नारी तस्या अङ्गं प्रमार्जयेत्॥ १४॥
अर्थ:
यह कवच मुझे अत्यंत प्रिय है और यह हरिभक्ति को बढ़ाता है।
यदि कोई स्त्री मृत संतानवाली हो तो साधक उसके शरीर पर इस कवच का जल से प्रयोग करे।
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सा पुत्रं लभते दीर्घजीविनं चाप्यरोगिणम्।
वन्ध्याया मार्जयेदङ्गं कुशैर्मन्त्रेण साधकः॥ १५॥
अर्थ:
ऐसी स्त्री शीघ्र ही दीर्घायु और आरोग्ययुक्त पुत्र को जन्म देती है।
यदि वह वंध्या हो तो साधक कुश से उसके अंगों का स्पर्श इस मंत्र से करे।
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सापि संवत्सरादेव गर्भं धत्ते मनोहरम्।
अश्वत्थेराजवश्यार्थी जपेदग्नेः सुभूपभाक्॥ १६॥
अर्थ:
वह एक वर्ष के भीतर ही सुन्दर संतान को प्राप्त करती है।
जो राजा को वश में करना चाहे वह अग्नि के समीप इसका जप करे।
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पलाशमूले विद्यार्थी तेजोर्थी अभिमुखो रवेः।
कन्यार्थी चण्डिकागेहे शत्रुहत्यै गृहे मम॥ १७॥
अर्थ:
विद्यार्थी पलाश के मूल में, सूर्य की दिशा की ओर मुख करके जपे तो तेज और बुद्धि प्राप्त करता है।
कन्यावान्छी व्यक्ति चंडीदेवी के मन्दिर में जपे तो कन्या प्राप्त करता है।
शत्रुनाशक जप अपने घर में करना उत्तम है।
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श्रीकामो विष्णुगेहे च उद्याने स्त्रीवशा भवेत्।
किमत्र बहुनोक्तेन शृणु सैन्येश तत्त्वतः॥ १८॥
अर्थ:
जो व्यक्ति श्री (लक्ष्मी) की प्राप्ति चाहे, वह विष्णु के मंदिर में जपे।
जो स्त्री को वश में करना चाहे, वह उद्यान (बाग) में जपे।
हे वीर! क्या अधिक कहें, यह सब तत्त्व से सुनो।
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यं यं काममभिध्यायेत् तं प्राप्नोत्यसंशयम्।
मम गेहगतस्त्वं तु तारकस्य वधेच्छया॥ १९॥
अर्थ:
जो जो मनोभाव से इसका जप करता है, वह वही फल निःसंदेह प्राप्त करता है।
भगवान कह रहे हैं — हे भक्त! यदि तू तारक दैत्य के वध की इच्छा रखता है, तो भी तुलसी कवच से वह संभव है।
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जपन् स्तोत्रं च कवचं तुलसीगतमानसः।
मण्डलात्तारकं हंता भविष्यसि न संशयः॥ २०॥
अर्थ:
जो व्यक्ति तुलसी के प्रति एकाग्र मन रखकर इस स्तोत्र और कवच का जप करता है,
वह अपने जीवन के सारे “तारक रूपी” (अर्थात् कठिन शत्रु, दुःख, दोष) का नाश कर देता है — इसमें कोई संदेह नहीं।
समापन
इति श्री ब्रह्माण्डपुराणे तुलसीमाहात्म्ये
तुलसीकवचं नाम स्तोत्रं सम्पूर्णम्॥
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🌷2⃣🌷 श्री तुलसी कवचम् (२) हिन्दी अर्थ सहित) 🌷🌷
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कवचं तव वक्ष्यामि भवसङ्क्रमनाशनम् ।
यस्य जापेन सिद्ध्यन्ति सर्वार्था नातियत्नतः ॥१
अर्थ:
अब मैं तुलसी देवी का वह कवच कहता हूँ जो जन्म-मृत्यु रूपी संसार के दुखों को नष्ट करता है।
जिसके जप से बिना अधिक प्रयास के सभी अभिलाषाएँ पूर्ण होती हैं।
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तुलसी पातु मे नित्यं शिरोवक्त्रोष्ठनासिकाः ।
श्रोत्रनेत्रललाटं च भ्रूकपोलं निरन्तरम् ॥
अर्थ:
तुलसी देवी मेरे सिर, मुख, होंठ, नासिका, कान, नेत्र, ललाट, भौंहों और गालों की सदा रक्षा करें।
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श्रीसखी पातु मे कण्ठं भुजौ वक्षश्च कक्षकम् ।
पृष्ठं च पिठरं सर्वं स्तनं जानू च हृत्तटम् ॥
अर्थ:
भगवान श्रीहरि की सखी तुलसी मेरे कंठ, भुजाओं, वक्षस्थल, कंधों, पीठ, वक्ष, जाँघ और हृदय की रक्षा करें।
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शुभा पातूदरं नाभिं पार्श्वं हस्ताङ्गुलिं तथा ।
जाठरं वह्निमखिलं गुदं जघनगुह्यकम् ॥
अर्थ:
शुभा देवी (तुलसी का मंगलमय रूप) मेरे उदर, नाभि, पार्श्व (पसलियों के भाग), हाथों, अंगुलियों, जठराग्नि, गुदा, जंघा और गुप्तांग की रक्षा करें।
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पापहारिण्यवतु मे ऊरू स्फिङ्मांसजानुकम् ।
पुण्यदाऽवतु मे जङ्घे पादौ नारदसेविता ॥
अर्थ:
पापों को हरने वाली तुलसी मेरे ऊरु (जाँघों), मांसपेशियों और घुटनों की रक्षा करें; पुण्य देने वाली तुलसी मेरी जाँघों और नारद मुनि द्वारा पूजित तुलसी मेरे चरणों की रक्षा करें।
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यदुक्तं यच्च नोक्तं मे यद्बाह्यं यत्तथान्तरम् ।
सर्वाङ्गं पातु मे देवी नारायणमनः प्रिया ॥
अर्थ:
जो कहा गया या नहीं कहा गया, जो बाहरी है या भीतरी, उस सब अंग की रक्षा नारायण की प्रिय तुलसी देवी करें।
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इतीदं कवचं दिव्यं तुलस्याः सर्वसिद्धिकृत् ।
त्रिसन्ध्यं यो जपेत्तस्य श्रीर्विद्याऽऽयुश्च वर्धते ॥
अर्थ:
यह दिव्य तुलसी कवच सब सिद्धियाँ देने वाला है। जो इसे प्रातः, मध्यान्ह और सायंकाल तीनों संधियों में जपता है, उसकी लक्ष्मी, विद्या और आयु में वृद्धि होती है।
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प्राचीः षड् विलिखेद्रेखाः उदीचीं पञ्च चैव हि ।
सङ्ख्यानां विंशतिस्तत्र कोष्ठानां तु भविष्यति ॥
अर्थ:
पूर्व दिशा की ओर छह रेखाएँ और उत्तर दिशा की ओर पाँच रेखाएँ खींचे —
इस प्रकार कुल बीस खानों वाला एक यंत्र बनेगा।
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कोष्ठे कोष्ठे लिखेत्पादं मन्त्रस्यास्य यथाक्रमम् ।
भूर्जे रोचनया विद्वान् कोष्ठं कुङ्कुममिश्रया ॥
अर्थ:
विद्वान व्यक्ति प्रत्येक खाने में इस मन्त्र का एक-एक पद लिखे —
भूर्जपत्र पर रोचना और कुमकुम से मिलाकर यंत्र लिखना चाहिए।
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यस्य यन्त्रमिदं मूर्ध्नि भुजे कण्ठेऽथवा भवेत् ।
सङ्ग्रामे व्यवहारे च चोरव्याघ्रभयेषु च ॥
अर्थ:
जो यह तुलसी यंत्र अपने सिर, भुजा या कंठ में धारण करता है,
वह युद्ध, विवाद, चोर, व्याघ्र (शत्रु) और भय से सदा सुरक्षित रहता है।
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मारीभये वर्षभये निर्घात भयपीडिते ।
क्षयापस्मारपीडासु सर्पवृश्चिकलूलके ॥
अर्थ:
मारी (महामारी), वर्षा के भय, बिजली के आघात, क्षय-अपस्मार, सर्प-दंश या वृश्चिक के दंश में भी यह कवच रक्षा करता है।
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तापज्चरेऽथवा शीते नेत्ररोगे च दुःसहे ।
न तस्य किञ्चिद् दुरितमिहामुत्र च जायते ॥
अर्थ:
ताप, ज्वर, शीत, नेत्ररोग और किसी भी असह्य पीड़ा में भी
इस कवचधारी व्यक्ति को इस लोक और परलोक में कोई कष्ट नहीं होता।
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वन्ध्या या धारयेद्यन्त्रं अचिरात्पुत्रिणी भवेत् ।
इतीदं कवचं प्रोक्तं वादे च विजयप्रदम् ॥
अर्थ:
जो निःसंतान स्त्री यह यंत्र धारण करती है, वह शीघ्र पुत्रवती होती है।
यह कवच विवाद या वाद-विवाद में विजय देने वाला भी है।
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गोमयेन मृदा चैव निर्माय प्रतिवादिनम् ।
लम्बमानां तस्य जिह्वां कृत्वा च निहया लिपेत् ॥
अर्थ:
यदि किसी शत्रु का वचन रुकवाना हो, तो गोबर और मिट्टी से उसका प्रतीक बनाकर उसकी जिह्वा पर यह कवच लिखना चाहिए।
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वामपादेन चाक्रम्य तज्जिह्वां कवचं जपेत् ।
अचिरात्तस्य जिह्वायाः स्तम्भो भवति संसदि ॥
अर्थ:
बाएँ पैर से उसे स्पर्श करके यह कवच जपने पर उसके वचन रुक जाते हैं, सभा में वह निःशब्द हो जाता है।
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वश्यमाकर्षणं चैव स्तम्भनोच्चाटने तथा ।
द्वेषणं मारणं चैव मन्त्रेणानेन विन्दति ।
अर्थ:
इस कवच के मन्त्र से वशीकरण, आकर्षण, स्तम्भन, उच्छाटन, द्वेषण और मारण जैसी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं (शुभ कार्य हेतु प्रयोग)।
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विन्यस्तकवचो यस्तु मन्त्रराजेन मन्त्रितम् ।
भक्षयेत्तु त्वचं तस्य वाक्पतित्वं न संशयः ॥
अर्थ:
जो व्यक्ति इस कवच को मन्त्रराज से अभिमंत्रित कर धारण करता है, वह अत्यंत वाक्पटु और प्रभावशाली हो जाता है।
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काम्यसिद्धिर्मयोक्ता ते मोक्षसिद्धिं निशामय ।
यो नवैस्तुलसीपत्रैः सालग्रामशिलार्चनम् ॥
अर्थ:
मैंने तुम्हें काम्य-सिद्धि बताई, अब मोक्ष-सिद्धि सुनो —
जो व्यक्ति नौ तुलसीपत्रों से सालग्राम भगवान का पूजन करता है...
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कुर्यात्पुरुषसूक्तेन तस्य मोक्षः करे स्थितः ॥
अर्थ:
और उसे पुरुषसूक्त से अर्चन करता है,
उसके हाथ में ही मोक्ष निहित रहता है।
इति श्री तुलसी कवचम् (द्वितीयम्) सम्पूर्णम्।
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🌺 🙏🏻 जय माता दी 🙏 🌺
🌺 जय मां आदिशक्ति 🌺
🌺 मां के चरणों में जन्नत है 🌺
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