संक्षिप्त कृष्णलीला
🌼 संक्षिप्त कृष्णलीला 🌼
🛐देवताओं द्वारा माता देवकी के गर्भ की स्तुति🛐
🌍जब-जब धरती पर धर्म की हानि होती है और अधर्म की सत्ता प्रतिष्ठित होने लगती है; तब-तब साधुजनों की रक्षा, दुष्टों के समूल विनाश तथा धर्म की पुनर्स्थापना के लिये भगवान् विविध रूपों में अवतरित हुआ करते हैं।🌍
‼️द्वापर-युग की बात है। मथुरा में उग्रसेन नाम के राजा हुए। वे स्वयं तो अत्यन्त न्यायप्रिय और प्रजा-वत्सल थे, किंतु उन्हीं का पुत्र कंस बड़ा ही क्रूर, निर्दयी और अत्याचारी निकला। उसके भय से धरती त्राहि-त्राहि कर उठी। कंस के ही समान अन्य अनेक आतताइयों का बोझ धरती के लिये और भी दुःसह हो गया था। गौका रूप धारण कर वह देवताओं के साथ भगवान् की शरण में पहुँची। दीन-वत्सल भगवान् ने धरती को दुष्टों के बोझ के मुक्त करने के लिये अवतार लेने का निर्णय लिया।‼️
💐कंस को अपनी चचेरी बहिन देवकी से स्नेह था। देवकी का विवाह वसुदेव से हुआ। कंस स्वंय देवकी-वसुदेव को रथ में बैठाकर पहुँचाने ले चला। रास्ते में ही वह था कि आकाशवाणी हुई–‘मूर्ख कंस! इस देवकी के गर्भ से उत्पन्न आठवाँ पुत्र तेरी मृत्यु का कारण बनेगा।’ यह सुनकर कंस देवकी को मारने के लिये उद्यत हो गया।💐
❣️वसुदेव ने समझाया–‘तुम्हारा शत्रु देवकी नहीं, उससे उत्पन्न पुत्र ही तो होगें। मैं इसके सभी पुत्र तुम्हें सौंप दिया करूँगा।’ कंस मान गया। किंतु वसुदवे-देवकी को उसने वापस लाकर कारागार में डाल दिया। ❣️
🤱देवकी के क्रमशः छः पुत्रों को आततायी कंस ने मार डाला। सातवें गर्भ के रूप में अनन्त भगवान् (शेष जी)-को आना था। परमात्मा प्रभु की इच्छा से योग माया ने देवकी के उस गर्भ का संकर्षण कर उसे वसुदेव जी की दूसरी पत्नी रोहिणी के उदर में स्थापित कर दिया, जो कंस के ही भय से गोकुल में नन्द जी के यहाँ रहती थीं। अब आठवें गर्भ के रूप में देवकी ने साक्षात् परमपिता को धारण किया। देवता लोग अपने- अपने लोकों से आकर गर्भवास कर रहे परमात्मा प्रभु की स्तुति करने लगे।
🕉️ भगवान् का प्राकट्य 🕉️
🤱माता देवकी के इस आठवें गर्भ के प्रसव का समय जैसे-जैसे समीप आ रहा था, वैसे-वैसे उनकी शोभा बढ़ती जा रही थी। उनका तेज देख कंस को भी विश्वास हो गया था कि यह गर्भ निश्चय ही उसका काल है। उसने कारागार पर पहरा और कड़ा कर दिया। 🤱
💢भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि थी। बुधवार की रात आधी बीत चुकी थी। पूर्व दिशा में चन्द्रमा का उदय होने वाला था। सहसा कारागार की वह कोठरी, जिसमें वसुदवे-देवकी कैद थे, प्रकाश से भर उठी। परम कृपालु भगवान् अपने चतुर्भुज रूप में प्रकट हो गये। भाव-विभोर होकर वसुदेव जी और माता देवकी प्रभु की स्तुति करने लगे। कंस के भय से त्रस्त माता-पिता को भगवान् ने आश्वस्त किया। माता के कहने पर वे अपना दिव्य चतुर्भुज रूप त्यागकर शिशु रूप में परिवर्तित हो गये। वसुदेव जी से उन्होंने पहले ही कह दिया था– ‘आप मुझे गोकुल में नन्द जी के यहाँ पहुँचा दें और उनकी पत्नी यशोदा जी की नवजात पुत्री को यहाँ ले आयें।’💢
💦भगवान् की योगमाया के प्रभाव से वसुदेव की हथकड़ी- बेड़ी खुल चुकी थी। कारागार के रक्षक प्रहरी निद्रा के वशीभूत हो गये थे। वसुदेव जी ने एक सूप में भगवान् के उस शिशु रूप को रखा और उन्हें सिर पर उठाकर वे गोकुल की ओर चल पड़े। यमुना जी ने प्रभु-चरणों का स्पर्श कर उन्हें रास्ता दिया। शेषनाग जी अपने फणों का छाता फैलाये मुसलाधार वर्षा से शिशु की रक्षा करने लगे। योगमाया के प्रभाव से माता यशोदा भी अपने तत्काल उत्पन्न पुत्री से अनभिज्ञ गहरी निद्रा में थीं। शिुश रूप प्रभु को उनके समीप सुलाकर और उनकी कन्या को लेकर वसुदेव जी वापस मथुरा लौट आये। उनके कारागार में पहुँचते ही योगमाया का प्रभाव लुप्त हो गया। पुनः हथकड़ी- बेड़ियों से वे आबद्ध हो गये। कन्या- शिशु-रुदन करने लगी। कारागार-रक्षक जग गये और उन्होंने कंस से देवकी के पुत्र उत्पन्न होने का समाचार सुना दिया।💦
🧑🍼शिशु-लीला🧑🍼
🌞कारागार-रक्षकों से देवकी के आठवाँ पुत्र उत्पन्न होने का समाचार सुनकर हड़बड़ाया कंस दौड़कर वहाँ पहुँचा। माता देवकी ने बिलखकर कहा–‘भइया! यह तो लड़की है, आप-जैसे योद्धा का भला क्या बिगाड़ सकेगी? इसे तो मुझसे मत छीनो!!’ किंतु आततायी कंस भला क्यों मानता? उसने देवकी की गोद से उस नन्हीं कन्या को झपट लिया। वह उसे घुमाकर पटकना ही चाहता था कि कन्या उसके हाथ से छूटकर आकाश में चली गयी। वस्तुतः भगवान् की योगमाया ही थी वह। चतुर्भुज रूप से आकाश में प्रकट होकर उसने कहा–‘अरे दुष्ट! तुझे मारने वाला कहीं और उत्पन्न हो गया है।’ 🌞
🤹लज्जित कंस ने वसुदेव- देवकी से क्षमा माँग कर उन्हें कारागार से मुक्त कर दिया, किंतु साथ ही उसने अपने सेवकों को आदेश दे दिया कि वे उसके राज्य में उत्पन्न सारे नवजात शिशुओं को ढूँढ़कर मार डालें।🤹
🪔इधर गोकुल में नन्द बाबा के यहाँ शिशुरूप भगवान् की लीला प्रारम्भ हो गयी थी। नन्द बाबा गोपों के मुखिया थे। अतः उनके यहाँ शिशु उत्पन्न होने का उत्सव सारा गोकुल मना रहा था। वह दिव्य शिशु था भी ऐसा। जो कोई उसे देखता उसी का हो जाता। उसके साँवले-सलोने अनुपम रूप की चर्चा दूर-दूर तक फैलने लगी थी। कंस और उसके सेवक भी यह समाचार सुन चुके थे।🪔
🛐फिर क्या था! कंस के दुष्ट सेवक गोकुल की ओर आने लगे-इस दुराशा में कि वे नन्द बाबा के उस अनुपम शिशु को मारकर कंस द्वारा पुरस्कृत होंगे। सबसे पहले विषयुक्त स्तनों वाली पूतना आयी और प्रभु को स्तन पान कराने लगी। प्रभु ने स्तनपान करते-करते उसके प्राण पी लिये। तदनन्तर कौवे का रूप धारण कर कंस का एक अन्य दुष्ट सेवक आया। शिशु रूप श्रीकृष्ण पालने में लेटकर अकेले किलकारियाँ भर रहे थे। काकासुर अपनी चोंच से उन पर प्रहार करना ही चाहता था कि प्रभु ने उसका गला पकड़ लिया और इस तरह उछाला कि वह सीधे कंस के आगे जा गिरा। इसी प्रकार शकटासुर और तृणावर्त आदि कंस के अनेक दुष्ट अनुचरों का शिशुरूप में ही प्रभु ने उद्धार कर दिया।🛐
👩❤️👩 गोकुल का आनन्द 👩❤️👩
🍀नन्दबाबा का आँगन दो-दो शिशुओं की किलकारियों से चहक उठा था। मैया यशोदा का साँवला- सलोना और माता रोहिणी का कर्पूर- गौर शिशु। एक दिन यदुवंशियों के कुल-पुराहित गर्गाचार्य जी आये। उन्होंने दोनों शिशुओं का नामकरण किया। रोहिणी-नन्दन ‘बलराम’ हुए और यशोदा के लाल ‘श्रीकृष्ण’। गर्गाचार्य जी ने बता दिया कि ये कोई साधारण बालक नहीं हैं। बलराम यदि शेषावतार हैं तो श्रीकृष्ण स्वयं साक्षात् परब्रह्म। धरती से दुष्टों का बोझ उतारने के लिये ही इन्होंने मनुष्य रूप में अवतार लिया है।🍀
🌷गोकुल का आनन्द बढ़ाते हुए दोनों शिशु बड़े होने लगे। उनकी नटखट शरारतें सबका मन मोह लेतीं। नन्दबाबा के आँगन में वे कभी घुटनों के बल चलते हैं तो कभी माताओं की गोद में बैठने के लिये मचल पड़ते हैं। कभी आपस में लड़ बैठते हैं, तो कभी परस्पर दुलार भी दिखाने लगते हैं।
श्रीकृष्ण की चंचलता देखकर तो स्वयं चंचलता भी लज्जित हो जाती है। अपनी परछाई मणिमय आँगन में देखकर वे उसे पकड़ने के लिये आतुर होते हैं और असफल होने पर ठुनकने लगते हैं।🌷
🌙आकाश में उगे हुए चन्द्रमा को खिलौना समझ मैया से उसे लाने की जिद करते हैं और जिद पूरी न होने पर रोने लगते हैं। मैया यशोदा को परात में पानी भरकर आँगन में रखना पड़ता है और उसमें चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को देखकर ही बालक श्रीकृष्ण को कुछ संतोष होता है। 🌙
👩❤️👩गोकुल-निवासी गोप-गोपियों की भीड़ नन्दबाबा के भवन में अकारण भी जुटी रहती है, केवल श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण की एक झलक पाने के लिये। उन्हें अपने घर की सुध-बुध बिसर गयी है। वैसे भी जिस रूप की छटा बड़े- बडे़ देवताओं, योगियों-मुनियों तक को अभिभूत कर देती है, उससे साधारण गोप-गोपियाँ कैसे मन्त्र-मुग्ध न हों? आज तो महादेव शंकर भी प्रभु के बालरूप की झलक प्राप्त करने गोकुल में नन्दबाबा के द्वार आ पहुँचे। गोकुल के आनन्द की सीमा
कहाँ!👩❤️👩
🪴 ऊखल-बन्धन 🪴
🧑🍼श्रीकृष्ण-बलराम अब चलना-फिरना सीख चुके थे। नन्द बाबा के आँगन से बाहर निकल कर अब वे गोकुल की गलियों में घूमने लगे थे। ग्वाल-बालों के साथ खेलना-कूदना और ऊधम मचाना उनकी दिनचर्या बन गयी थी। भगवान् श्रीकृष्ण की शैतानियाँ गोकुलवासियों के मनोरंजन का साधन बनी हुई थीं।🧑🍼
‼️ प्रभु माखन-प्रेमी थे। घर में माखन की कमी थी भी नहीं; किंतु प्रभु को तो अपनी लीलाओं से भक्तजनों को सुख पहुँचाना ही चिर इष्ट रहा है। अतः वे माखन- चोर बन बैठे। साथी ग्वाल-बालों को लेेकर वे किसी भी गोप के घर जा धमकते। खुद माखन खाते, साथियों को खिलाते और बचे हुए माखन को इधर-उधर बिखेर भी देते।‼️
🤱गोपियाँ मन-ही-मन यही चाहती थीं कि नटखट श्याम किसी भी बहाने उनके यहाँ आया करें; किंतु दिखावे के लिये वे उनको डाँटती-धमकातीं तथा उलाहना लेकर मैया यशोदा के पास पहुँच जातीं। यह बात अलग थी कि जब कभी मैया यशोदा श्रीकृष्ण को दण्ड देने के लिये उद्यत होतीं तो तत्काल वे उनका निहोरा करने लगतीं। वस्तुतः मन से तो वे श्यामसुन्दर की भक्त ही थीं। 🤱
✍️एक दिन नटखट श्रीकृष्ण की शरारतों से तंग आकर माता यशोदा ने उन्हें ऊँखल में रस्सी लेकर बाँध दिया। प्रभु को तो इसी बहाने किसी का उद्धार करना था। ऊखल को आड़ा करके उन्होंने गिरा लिया और उसे घसीटते हुए उधर चले जिधर अर्जुन के दो वृक्ष आपस में सटे खड़े थे। प्रभु ने स्वयं उन वृक्षों के बीच से निकलकर जैसे ही ऊखल को खींचा, दोनों वृक्ष अरराकर धरती पर आ गिरे। वस्तुतः वे दोनों यक्षराज कुबेर के पुत्र नलकूबर और मणिग्रीव थे जो देवर्षि नारद के शापवश वृक्ष बन गये थे। प्रभु की स्तुति करके दोनों अपने लोक चले गये। माता यशोदा तो यह दृश्य देखकर स्तब्ध रह गयीं। उन्होंने दौड़कर अपने लाल को गले लगा लिया।✍️ ⚕️⚕️कालिय-मर्दन⚕️⚕️
❣️गोकुल में आये दिन होने वाले उत्पातो से भयभीत होकर गोपों सहित नन्दबाबा ने वृन्दावन जाकर बसने का निर्णय लिया। फिर एक दिन सारा ब्रजमण्डल यमुना पार करके वृन्दावन आकर गया। भगवान् श्रीकृष्ण धीरे-धीरे पाँच वर्ष के हो चले थे। बड़े भइया बलराम जी और अन्य ग्वाल-बालों के साथ अब वे भी गायों को चराने जाने लगे।❣️
🧑🍼कंस के दुष्ट सेवकों ने यहाँ भी श्रीकृष्ण का पीछा किया। वत्सासुर बछड़े का रूप धारण कर एक दिन उन गायों के झुण्ड में आ मिला, जिन्हें प्रभु अपने बालसखाओं के साथ चरा रहे थे। उसकी कुत्सित चाल भला सर्वेश्वर से कैसे छिपती? दोनों पिछले पैरों को पकड़कर प्रभु ने उसे हवा में घुमाया और एक वृक्ष की जड़ पर पटक दिया। वत्सासुर के प्राण- पखेरू उड़ गये। इसी प्रकार वकासुर, व्योमासुर तथा अघासुर आदि का भी बालक श्रीकृष्ण ने देखते-देखते संहार कर दिया। गोप-बालकों की श्रद्धा अपने इन अद्भुत पराक्रमी मित्र के प्रति और बढ़ गयी थी।🧑🍼
🙏लोकपितामह ब्रह्मा ने एक बार प्रभु की परीक्षा लेने के लिये सभी गाय-बछड़ों और गोप- बालकों को चुरा लिया। सर्वज्ञ श्रीकृष्ण ने स्वयं ही गायों, बछड़ों और गोप-बालकों का रूप धारण कर लिया। एक वर्ष पश्चात् ब्रह्मा जी अपनी भूल के लिये पश्चात्ताप करते हुए प्रभु के पास आये और ग्वाल-बालों तथा गायों-बछड़ों को लौटाकर प्रभु की स्तुति करते हुए अपने लोक चले गये।🙏
⚕️⚕️यमुना नदी में कालिय नामक एक विषैला सर्प रहता था। उसके विष के प्रभाव से वह ह्नद का जल सब के लिये उपयोगी हो सके, इस उद्देश्य से भगवान् श्रीकृष्ण एक दिन उसमें कूद पड़े। कालिय के शताधिक फणों को उन्होंने कुचल दिया। उसकी पत्नियों की प्रार्थना से द्रवीभूत होकर प्रभु ने उसे यमुना छोड़कर चले जाने का आदेश दे दिया।⚕️
🤱द्रौपदी पर कृपा🤱
🚩द्रौपदी पाण्डवों की पत्नी और भगवान् श्रीकृष्ण की अनन्य भक्त थीं। पाण्डवों के प्रति धृतराष्ट्र- पुत्र दुर्योधन सदैव द्वेष- भाव रखता था। उनकी राजधानी इन्द्रप्रस्थ का वैभव कपटी दुर्योधन के मन में दाह उत्पन्न करने लगी। पाण्डवों को छल-बल से नीचा दिखाने के लिये दुर्योंधन ने हस्तिनापुर में जुए का आयोजन किया।🚩
🌌जुआ सर्वनाश की जड़ है। ज्येष्ठ पाण्डु-पुत्र युधिष्ठिर जुए में राज्य, भाइयों तथा पत्नी द्रौपदी तक को गँवा बैठे। दुष्ट दुर्योंधन ने मर्यादाओं को ताक पर रख दिया। उसने अपने भाई दुःशासन से द्रौपदी को वस्त्रहीन कर देने के लिये कहा। द्रौपदी को निर्वस्त्र करने का उसका आदेश सुनकर हस्तिनापुर की सभा काँप उठी, किंतु सभी विवश थे। कुरुवंशी दुःशासन कुरुवंश की ही एक कुलवधू को नंगा करने का प्रयास करने लगा। अबला भक्त का अपमान! भला, कृपालु श्रीकृष्ण कैसे सहते!! वस्त्रावतार हुआ उनका। द्रौपदी की लाज बच गयी। फिर भी, जुए की शर्त के अनुरूप पतियों के साथ दौपदी को भी बारह वर्ष वनवास और एक वर्ष अज्ञातवास का कष्ट भोगना पड़ा।🌌
🍀वन में भी जिस-किसी तहर पाण्डवों को संकट में डालना दुर्योधन का एकमात्र लक्ष्य था। उसी के अनुरोध पर एक दिन परम क्रोधी मुनि दुर्वासा अपने दस हजार शिष्यों के साथ पाण्डवों के यहाँ पधारे। 🍀
🧘उन्होंने ऐसे समय भोजन की माँग की जब पाण्डवों सहित द्रौपती भी भोजन कर चुकी थीं। द्रौपदी के भोजन कर लेने के बाद पाण्डवों का वह अक्षय भोजन- पात्र भी और अधिक भोजन देने में अक्षम हो जाता था जिसे भगवान् सूर्य ने उन्हें दिया था।
आखिर द्रौपदी की आर्त पुकार सुन भगवान् श्रीकृष्ण आये और उस भोजन-पात्र में चिपका हुआ साग का एक पत्ता उन्होंने खा लिया। दुर्वासा और उनके शिष्य नदी में स्नान करते हुए बिना भोजन किये ही डकारने लगे और भाग चले। इस प्रकार द्रौपदी और उनके पतियों के प्रत्येक कष्ट का निवारण प्रभु श्रीकृष्ण सदैव करते रहे।🧘
🕉️कौरव सभा में विराट-रूप🕉️
🌍पाण्डवों के वनवास और अज्ञातवास की अवधि पूरी हो चुकी थी। शर्त के अनुसार उन्हें अपना राज्य वापस मिलना चाहिये था, किंतु दुष्ट दुर्योधन कैसे मानता भला? उसने पाण्डवों को उनका अधिकार देने से साफ इनकार कर दिया। उसे समझाने के लिये भगवान् श्रीकृष्ण ने दूत बनने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।🌍
🛐पाण्डवों के दूत बनकर प्रभु हस्तिनापुर आये। दुर्योधन भी प्रभु के प्रभाव से अपरिचित न था। उसने श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने की मंशा से भाँति-भाँति के व्यंजन बनवाये; किंतु प्रभु श्रीकृष्ण व्यंजनों के भूखे तो हैं नहीं, वे तो केवल भाव के भूखे हैं। अतः उन्होंने दुर्योधन का अतिथि बनना अस्वीकार कर दिया। महात्मा विदुर यद्यपि दुर्योधन के ही महामन्त्री थे, तथापि प्रभु-चरणों में उनकी अविचल निष्ठा थी। उनकी अविचल निष्ठा थी। उनकी भक्ति के वशीभूत होकर भगवान् श्रीकृष्ण उनके अतिथि बने।
महात्मा विदुर की पत्नी भी भगवान् की अनन्य भक्त थीं। प्रभु जब उनके घर पहुँचे तब विदुरजी घर पर नहीं थे। अकेले विदुर- पत्नी मन-ही-मन भगवत्स्मरण कर रही थीं। 🛐
🤱सहसा भगवान् श्रीकृष्ण को अपने अतिथि के रूप में पाकर वे भाव-विह्नल हो उठीं। उन्हें अपने देह तक की सुध न रही। बड़े प्रेम से वे प्रभु को एक आसन पर बैठाकर उन्हें केले खिलाने लगीं। प्रेम-भक्ति की तन्मयता की पराकाष्ठा पर पहुँचकर वे श्रीकृष्ण को केले का छिलका तो खिला देती, और गूदे जमीन पर फेंक देतीं। प्रभु श्रीकृष्ण उन छिलकों को खाकर ही परम संतुष्ट हुए।
भगवान् श्रीकृष्ण ने दुर्योधन को बहुत समझाया, किंतु वह मूर्ख बिना युद्ध किये सुई की नोक के बराबर भी भूमि पाण्डवों को देने के लिये तैयार नहीं हुआ। उसने तो भगवान् को कैद भी करना चाहा, किंतु सर्वव्यापी परमात्मा को कोई कैद कैसे कर सकता है भला! दुर्योधन के दुस्साहस के जवाब में श्रीकृष्ण ने उसे अपना भयंकर विराट् रूप दिखाया। भगवान् का विराट् रूप देखकर दुर्योधन की घिग्घी बँध गयी।
🙏पार्थ-सारथि श्रीकृष्ण🙏
🕉️भगवान् श्रीकृष्ण धरती से असुरों का बोझ शीघ्र हटा देना चाहते थे। उनकी इच्छा दुर्योधन की हठवादिता में प्रकट हुई। अभूतपूर्व युद्ध की भूमिका बन गयी। दोनों पक्ष अपनी-अपनी तैयारियों में जुट गये। पाण्डवों के साथ धर्म का सम्बल था और दुर्योधन के साथ उसका अभिमान । अपनी-अपनी प्रवृत्ति के अनुकूल योद्धाओं को दोनों पक्ष आहूत करने लगा। दूर-दूर के राजाओं को युद्ध में भाग लेने के लिये निमन्त्रण भेजे जाने लगे।
भगवान् श्रीकृष्ण का सहयोग प्राप्त करने की इच्छा से अधर्मी दुर्योधन द्वारका पहुँचा। सर्वज्ञ प्रभु उस समय सो रहे थे। उधर पाण्डवों की ओर से भगवान् के चिर सखा श्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन भी उसी समय सहायता माँगने पहुँच गये। श्रीकृष्ण को निद्रा में देख अभिमानी दुर्योधन जहाँ उनके सिरहाने एक आसन पर बैठ गया, वहीं भक्त अर्जुन प्रभु के पाँव की ओर हाथ बाँधे खड़े रहे। भगवान् ने निद्रा-भंग होने पर पहले अर्जुन को ही देखा और आगमन का उद्देश्य पूछा। 🕉️
🧑🍼तमक कर दुर्योधन ने अर्जुन से पहले अपनी उपस्थिति की बात कही। भगवान् श्रीकृष्ण ने दोनों को सहायता का आश्वासन देते हुए कहा–‘एक ओर तो मैं रहूँगा; अकेला, निहत्था, युद्ध में शस्त्र तक नहीं उठाऊंगा; और दूसरी ओर मेरी विशाल सेना रहेगी। तुम दोनों को इनमें से जो रुचे, माँग लो।’🧑🍼
🤹अर्जुन ने कहा–‘प्रभो! मुझे तो बस ‘आप’ ही चाहिये, आप भले ही युद्ध न करें।’ मूढ़ दुर्योधन विशाल सेना पाकर ही स्वयं को कृतकृत्य समझ रहा था। उसे क्या पता कि जहाँ धर्म है, वहाँ श्रीकृष्ण हैं और जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहीं विजय है! अर्जुन ने भगवान् को माँगकर जहाँ अपनी जीत उस दिन सुनिश्चित कर ली, वहीं दुर्योधन की हार भी उसी दिन पक्की हो गयी। 🤹
🕉️भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन के रथ का सारथि बनना स्वीकार किया। पाण्डवों और कौरवों की विशाल सेनाएँ युद्धभूमि में आमने-सामने डट गयीं। युद्ध के बाजों की ध्वनियों से आकाश गुंजायमान हो उठा।
‼️ अर्जुन को उपदेश‼️
👩❤️👩युद्धभूमि में पहुँकर अर्जुन ने भगवान् से अपना रथ दोनों सेनाओं के मध्य ले चलने को कहा। वहाँ पहुँच कर अर्जुन ने प्रतिपक्ष में अपने ही सगे- सम्बन्धियों- गुरुजनों को देखा। वे मोहित होकर विषादग्रस्त हो गये। उनके मन में कायरतापूर्ण वैराग्य उत्पन्न हो गया।👩❤️👩
🌷अपने शिष्य की यह स्थिति देखकर भगवान् श्रीकृष्ण उपदेशक बन गये। उन्होंने कहा–‘अर्जुन! तुम जिनसे युद्ध न करने की बात कर रहे हो, वे सब पहले ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। तुम्हें तो बस, निमित्त बनना है। युद्ध करना क्षत्रिय-धर्म है। जो व्यक्ति अपने धर्म का पालन नहीं करता, उसे कहीं भी, किसी भी समय शान्ति नहीं मिल सकती। तुम मनुष्य हो , तो तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल की चिन्ता करने की तुम्हें आवश्यकता नहीं। तुम मेरी शरण में आ जाओ और मेरा स्मरण करते हुए युद्ध करो।’ इसी प्रकार की तमाम ज्ञानपूर्ण बातों से प्रभु श्रीकृष्ण ने अर्जुन को मिथ्या मोह से दूर किया तथा उन्हें अपना विश्वरूप दिखाकर आश्वस्त किया और युद्ध के लिये उद्यत किया। अर्जुन को भगवान् द्वारा दिया गया वह उपदेश ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के रूप में आज भी प्रसिद्ध एवं प्रासंगिक है।🌷
💢अन्ततः युद्ध प्रारम्भ हुआ। कौरव-पक्ष की ओर से पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, कुलगुरु कृपाचार्य, महान् धनुर्धर कर्ण आदि योद्धा अपनी वीरता का जौहर दिखाने लगे। इधर महाबली भीम, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, धृष्टद्युम्न, घटोत्कच-जैसे पराक्रमी अर्जुन की अगुवाई और भगवान् श्रीकृष्ण के सरंक्षण में शत्रु-सेना को गाजर-मूली की तरह काटने लगे। अठारह दिनों तक यह महासंग्राम चला। असंख्य योद्धा काल के गाल में समा गये। पाण्डवों की विजय हुई। भागकर छिपे दुर्योधन को भगवान् श्रीकृष्ण की प्रेरणा से महाबली भीम ने ललकार कर मार डाला। धृतराष्ट्र को अपनी भूल का पश्चात्ताप हुआ। भगवान् के शरणागत पाण्डवों को राज्य-सुख मिला।
🌞परमधाम-प्रस्थान🌞
🕉️प्रभु के अवतार का उद्देश्य धीरे-धीरे पूरा हो गया था। भगवान् श्रीकृष्ण आसुरी शक्तियों की सत्ता को धरती से निर्मूल कर धर्म की सत्ता प्रतिष्ठित कर चुके थे। अब उन्होंने लीला-संवरण का विचार किया, किंतु इससे पूर्व यदुवंशियों की अहंवादिता को भी वे मिटा देना चाहते थे। वास्तव में ‘श्रीकृष्ण हमारे राजा हैं’ ऐसा सोचकर यादवों को अभिमान हो गया था और वे स्वेच्छाचारी हो गये थे। इस मिथ्या अभिमान और स्वेच्छाचार को नष्ट करना प्रभु को आवश्यक प्रतीत हुआ।🕉️
👩❤️👩द्वारकावासियों को श्रीकृष्ण ने प्रभास-क्षेत्र में जाने का आदेश दिया। प्रभु की इच्छा बलवती होती है। प्रभास-क्षेत्र में द्वारका वासी यदुवंशियों ने कुछ ब्राह्मणों का अपमान किया और ब्राह्मणों ने उन्हें आपस में ही लड़-मरने का शाप दे दिया। यह वस्तुतः भगवान् की इच्छा ही थी। कुछ ही दिनों के अनन्तर सारे यादव सचमुच ही आपस में लड़कर मर-मिटे। शेषावतार बलरामजी ने भी आत्मस्वरूप में स्थित होकर मनुष्य-शरीर छोड़ दिया।👩❤️👩
❣️लीला समेटने का संकल्प लेकर भगवान् श्रीकृष्ण एक वृक्ष के नीचे शान्तभाव से बैठ गये। जरा नामक एक बहेलिये ने दूर से उन्हें मृग समझ लिया। उसने बाण छोड़ा, जो आकर प्रभु के बायें पैर के अगूँठे में लगा। निकट आने पर जरा ने जब प्रभु को देखा तब उसे भारी पश्चात्ताप हुआ। प्रभु-चरणों में गिरकर वह बारम्बार क्षमा- याचना करने लगा। किंतु भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी इच्छा बताकर उसे शरीर स्वर्ग भेज दिया। तदनन्तर स्वयं भी योगधरणा का आश्रय लेकर प्रभु अपने दिव्य गोलोकधाम चले गये।❣️
🛐लीला पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण की लीलाएँ अनन्त हैं, उनका यथार्थ वर्णन कर पाने में हजार मुख वाले शेष भी जब असमर्थता का अनुभव करते हैं; फिर हम साधारण जनों की क्या गिनती! हम तो बस उन महानतम प्रभु के चरणों में नतमस्तक होते हैं। 🛐
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