🌹🌹कर्ण ने कृष्ण से पूछा - मेरा जन्म होते ही मेरी माँ ने मुझे त्यज दिया। क्या अवैध संतान होना मेरा दोष था ??
द्रोणाचार्य ने मुझे सिखाया नहीं क्योंकि मैं क्षत्रिय पुत्र नहीं था, परशुराम जी ने मुझे सिखाया तो सही परंतु श्राप दे दिया कि जिस वक्त मुझे उस विद्या की सर्वाधिक आवश्यकता होगी, मुझे उसका विस्मरण होगा।- क्योंकि उनके अनुसार मैं क्षत्रिय ही था 
केवल संयोगवश एक गाय को मेरा बाण लगा और उसके स्वामी ने मुझे श्राप दिया जबकि मेरा कोई दोष नहीं था ।
द्रौपदी स्वयंवर में मेरा अपमान किया गया ।
माता कुंती ने मुझे आखिर में मेरा जन्म रहस्य बताया भी तो अपने अन्य बेटों को बचाने के लिए,जो भी मुझे प्राप्त हुआ है, दुर्योधन के दातृत्व से ही हुआ है ,तो अगर मैं उसकी तरफ से लड़ूँ तो मैं गलत कहाँ हूँ ??

कृष्ण ने उत्तर दिया :- 

कर्ण, मेरा जन्म कारागार में हुआ,जन्म से पहले ही मृ त्यु मेरी प्रतीक्षा में घात लगाए बैठा था।
जिस रात मेरा जन्म हुआ, उसी रात मातापिता से दूर किया गया ,तुम्हारा बचपन खड्ग, रथ, घोड़े, धनुष्य और बाण के बीच उनकी ध्वनि सुनते बीता । मुझे ग्वाले की गौशाला मिली, गोबर मिला और खड़ा होकर चल भी पाया उसके पहले ही कई प्राणघातक हमले झेलने पड़े 
कोई सेना नहीं, कोई शिक्षा नहीं। लोगों से ताने ही मिले कि उनकी समस्याओं का कारण मैं हूँ। तुम्हारे गुरु जब तुम्हारे शौर्य की तारीफ कर रहे थे, मुझे उस उम्र में कोई शिक्षा भी नहीं मिली थी। जब मैं सोलह वर्षों का हुआ तब कहीं जाकर ऋषि सांदीपन के गुरुकुल पहुंचा ।
तुम अपनी पसंद की कन्या से विवाह कर सके ।
जिस कन्या से मैंने प्रेम किया वो मुझे नहीं मिली और उनसे विवाह करने पड़े जिन्हें मेरी चाहत थी या जिनको मैंने रा क्षसों से बचाया था ।
मेरे पूरे समाज को यमुना के किनारे से हटाकर एक दूर समुद्र के किनारे बसाना पड़ा, उन्हें जरासंध से बचाने के लिए । रण से पलायन के कारण मुझे भीरु भी कहा गया,कल अगर दुर्योधन युद्ध जीतता है तो तुम्हें बहुत श्रेय मिलेगा,धर्मराज अगर जीतता है तो मुझे क्या मिलेगा ?? मुझे केवल युद्ध और युद्ध से निर्माण हुई समस्याओं के लिए दोष दिया जाएगा।

एक बात का स्मरण रहे कर्ण -:

हर किसी को जिंदगी चुनौतियाँ देती है, जिंदगी किसी के भी साथ न्याय नहीं करती। दुर्योधन ने अन्याय का सामना किया है तो युधिष्ठिर ने भी अन्याय भुगता है ,लेकिन सत्य धर्म क्या है यह तुम जानते हो ,कोई बात नहीं अगर कितना ही अपमान हो, जो हमारा अधिकार है वो हमें ना मिल पाये...महत्व इस बात का है कि तुम उस समय उस संकट का सामना कैसे करते हो ।
रोना धोना बंद करो कर्ण, जिंदगी न्याय नहीं करती इसका मतलब यह नहीं होता कि तुम्हें अधर्म के पथ पर चलने की अनुमति है ।
श्रीकृष्ण से हमे बहुत कुछ सीखा जा सकता है। 

कर्ण के अंतिम समय में भी श्रीकृष्ण ने ली थी उनके महादानी होने की परीक्षा

karan vadh by arjun

क्षत्रिय होते हुए भी कर्ण ने अपना पूरा जीवन सूतपुत्र के रूप में बिताया, कर्ण के पिता भगवान सूर्य और माता कुंती थी लेकिन फ़िर भी कर्ण को वो सम्मान नहीं मिला जिसके वो अधिकारी थे । परन्तु आज भी सामान्य बातो में अनायास ही हम दानवीर कर्ण का उदाहरण देने से नहीं चुकते है । ऐसे ही कर्ण और श्रीकृष्ण से जुडी एक रोचक कथा महाभारत में वर्णित है जिसको पढकर आपको वास्तव में लगेगा की क्यों कौरवों की सेना में होते हुए भी महारथी कर्ण महाभारत के एक ऐसे पात्र  थे जिनके सिद्धांतो और नैतिक मूल्यों के कारण श्रीकृष्ण भी उन्हें वीर योद्धा मानते थे ।

जब कर्ण युद्ध भूमि में पड़ा करहा रहा था तब सभी पांडव कर्ण के मारे जाने की ख़ुशी मना रहे थे। ऐसे ही समय में अर्जुन ने अहंकारवश श्रीकृष्ण से कहा की आपका दानवीर कर्ण तो समाप्त हो गया ।

arju krishan

भगवान कृष्ण समझ गए की अर्जुन को अहंकार हो गया है । अर्जुन की बात का जवाब देते हुए श्रीकृष्ण ने कहा की कर्ण दानी ही नहीं महा दानी है उसके काल में उससे बड़ा दानी कोई न हो सका ।

अर्जुन को श्रीकृष्ण की यह बात कुछ समझ नहीं आई, अर्जुन ने कहा की कर्ण महादानी है ये अब कैसे सत्यापित हो सकता है । श्रीकृष्ण ने कहा की युद्ध भूमि में मृत्यु की प्रतीक्षा करता कर्ण अभी भी साबित कर सकता है ।

कर्ण के महा दानवीर होने की परीक्षा लेने के लिए श्रीकृष्ण और अर्जुन ब्राह्मण का रूप धारण करके युद्ध भूमि में पहुँच  गए ।

श्रीकृष्ण कर्ण के पास आकर बोले की हे! अंग राज आपकी ऐसी अवस्था देख कर आपसे कुछ माँगने का भी साहस नहीं हो रहा इसलिए मेरा यहाँ से जाना ही उचित है । तब कर्ण ने ब्राह्मण को रोकते हुए कहा की हे ब्राह्मण! जब तक मेरे शरीर में प्राण है तब तक मेरे पास आया याचक लौट जाए ऐसा कैसे हो सकता है ।

तब कर्ण ने अपने समीप पड़े पत्थर से अपने दो सोने के दांत तोड़कर श्री कृष्ण को दे दिए। कर्ण की ऐसी दानवीरता देखकर श्रीकृष्ण काफी प्रभावित हुए। श्री कृष्ण ने कर्ण से कहा कि वह उनसे कोई भी वरदान मांग़ सकते हैं।

तब कर्ण ने कृष्ण से कहा कि निर्धन सूत पुत्र होने के कारण उनके साथ बहुत से छल हुए हैं। इसलिए आप अगली बार जब धरती पर अवतार लें तो पिछड़े वर्ग के लोगों के जीवन को सुधारने के लिए प्रयत्न करें ।

दूसरे वरदान के रूप में कर्ण ने कहा कि अगले अवतार में आप उन्हीं के राज्य में जन्म लें और तीसरे वरदान में कर्ण ने श्री कृष्ण से कहा कि उनका अंतिम संस्कार ऐसे स्थान पर हो जहाँ कोई पाप ना हुआ हो ।

पूरी पृथ्वी पर कोई ऐसा स्थान नहीं था जहाँ कोई पाप न हुआ हो इसलिए श्री कृष्ण ने कर्ण के वरदान की पूर्ति के लिए उनका अंतिम संस्कार अपने ही हाथों पर किया।


जय श्रीकृष्ण,जय गोविंद 🙏🚩

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