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ॐ 001.03 || भगवान का अवतार लेने का निश्चय

ॐ 01.03 || भगवान का अवतार लेने का निश्चय

गर्ग संहिता - 01
गोलोक खण्ड 
अध्याय 03

भगवान श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में श्रीविष्णु आदि का प्रवेश; देवताओं द्वारा भगवान की स्तुति; भगवान का अवतार लेने का निश्चय; श्रीराधा की चिंता और भगवान का उन्हें सांत्वना-प्रदान

श्री जनकजी ने पूछा- मुने ! परात्पर महात्मा भगवान श्रीकृष्णचन्द्र का दर्शन प्राप्त कर सम्पूर्ण देवताओं ने आगे क्या किया, मुझे यह बताने की कृपा करें।

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन ! उस समय सबके देखते-देखते अष्ट भुजाधारी वैकुण्ठधिपति भगवान श्रीहरि उठे और साक्षात भगवान श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में लीन हो गये। उसी समय कोटि सूर्यों के समान तेजस्वी, प्रचण्ड पराक्रमी पूर्ण स्वरूप भगवान नृसिंहजी पधारे और भगवान श्रीकृष्ण तेज में वे भी समा गये। इसके बाद सहस्र भुजाओं से सुशोभित, श्वेतद्वीप के स्वामी विराट पुरुष, जिनके शुभ्र रथ में सफेद रंग के लाख घोड़े जुते हुए थे, उस रथ पर आरूढ़ होकर वहाँ आये। उनके साथ श्रीलक्ष्मीजी भी थीं। वे अनेक प्रकार के अपने आयुधों से सम्पन्न थे। पार्षदगण चारों ओर से उनकी सेवा में उपस्थित थे। वे भगवान भी उसी समय श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में सहसा प्रविष्ट हो गये।

फिर वे पूर्णस्वरूप कमल लोचन भगवान श्रीराम स्वयं वहाँ पधारे। उनके हाथ में धनुष और बाण थे तथा साथ में श्रीसीताजी और भरत आदि तीनों भाई भी थे। उनका दिव्य रथ दस करोड़ सूर्यों के समान प्रकाशमान था। उस पर निरंतर चँवर डुलाये जा रहे थे। असंख्य वानर यूथपति उनकी रक्षा के कार्य में संलग्न थे। उस रथ के एक लाख चक्कों से मेघों की गर्जना के समान गम्भीर ध्वनि निकल रही थी। उस पर लाख ध्वजाएँ फहरा रही थीं। उस रथ में लाख घोड़े जुते हुए थे। वह रथ सुवर्णमय था। उसी पर बैठकर भगवान श्रीराम वहाँ पधारे थे। वे भी श्रीकृष्णचन्द्र के दिव्य विग्रह में लीन हो गये। फिर उसी समय साक्षात यज्ञनारायण श्रीहरि वहाँ पधारे, जो प्रलयकाल की जाज्वल्यमान अग्निशिखा के समान उद्भासित हो रहे थे। देवेश्वर यज्ञ अपनी धर्मपत्नि दक्षिणा के साथ ज्योतिर्मय रथ पर बैठे दिखायी देते थे। वे भी उस समय श्याम विग्रह भगवान श्रीकृष्णचन्द्र में लीन हो गये। तत्पश्चात् साक्षात भगवान नर-नारायण वहाँ पधारे। उनके शरीर की कांति मेघ के समान श्याम थी। उनके चार भुजाएँ थीं, नेत्र विशाल थे और वे मुनि के वेष में थे। उनके सिर का जटा-जूट कौंधती हुई करोड़ों बिजलियों के समान दीप्तिमान था।

उनका दीप्तिमण्डल सब ओर उद्भासित हो रहा था। दिव्य मुनीन्द्रमण्डलों से मण्डित वे भगवान नारायण अपने अखण्डित ब्रह्मचर्य से शोभा पाते थे। राजन ! सभी देवता आश्चर्ययुक्त मन से उनकी ओर देख रहे थे। किंतु वे भी श्याम सुन्दर भगवान श्रीकृष्ण में तत्काल लीन हो गये। इस प्रकार के विलक्षण दिव्य दर्शन प्राप्त कर सम्पूर्ण देवताओं को महान आश्चर्य हुआ। उन सबको यह भली-भाँति ज्ञात हो गया कि परमात्मा श्रीकृष्ण चन्द्र स्वयं परिपूर्णतम भगवान हैं। तब वे उन परमप्रभु की स्तुति करने लगे। देवता बोले- जो भगवान श्रीकृष्णचन्द्र पूर्ण पुरुष, परसे भी पर, यज्ञों के स्वामी, कारण के भी परम कारण, परिपूर्णतम परमात्मा और साक्षात गोलोकधाम के अधिवासी हैं, इन परम पुरुष श्रीराधावर को हम सादर नमस्कार करते हैं। योगेश्वर लोग कहते हैं कि आप परम तेज:पुंज हैं; शुद्ध अंत:करण वाले भक्तजन ऐसा मानते हैं कि आप लीला विग्रह धारण करने वाले अवतारी पुरुष हैं; परंतु हम लोगों ने आज आपके जिस स्वरूप को जाना है, वह अद्वैत सबसे अभिन्न एक अद्वितीय है; अत: आप महत्तम तत्त्वों एवं महात्माओं के भी अधिपति हैं; आप परब्रह्म परमेश्वर को हमारा नमस्कार है। कितने विद्वानों ने व्यंजना, लक्षणा और स्फोटद्वारा आपको जानना चाहा; किंतु फिर भी वे आपको पहचान न सके; क्योंकि आप निर्दिष्ट भाव से रहित हैं। अत: माया से निर्लेप आप निर्गुण ब्रह्म की हम शरण ग्रहण करते हैं। किन्हीं ने आपको ‘ब्रह्म’ माना है, कुछ दूसरे लोग आपके लिये ‘काल’ शब्द का व्यवहार करते हैं। कितनों की ऐसी धारणा है कि आप शुद्ध ‘प्रशांत’ स्वरूप हैं तथा कतिपय मीमांसक लोगों ने तो यह मान रखा है कि पृथ्वी पर आप ‘कर्म’ रूप से विराजमान हैं। कुछ प्राचीनों ने ‘योग’ नाम से तथा कुछ ने ‘कर्ता’ के रूप में आपको स्वीकार किया है। इस प्रकार सबकी परस्पर विभिन्न ही उक्तियाँ हैं। अतएव कोई भी आपको वस्तुत: नहीं जान सका। (कोई भी यह नहीं कह सकता कि आप यही हैं, ‘ऐसे ही’ हैं।) अत: आप (अनिर्देश्य, अचिंत्य, अनिर्वचनीय) भगवान की हमने शरण ग्रहण की है। भगवन ! आपके चरणों की सेवा अनेक कल्याणों के देने वाली है। उसे छोड़कर जो तीर्थ, यज्ञ और तप का आचरण करते हैं, अथवा ज्ञान के द्वारा जो प्रसिद्ध हो गये हैं; उन्हें बहुत-से विघ्नों का सामना करना पड़ता है; वे सफलता प्राप्त नहीं कर सकते।

भगवन ! अब हम आपसे क्या निवेदन करें, आपसे तो कोई भी बात छिपी नहीं है; क्योंकि आप चराचरमात्र के भीतर विद्यमान हैं। जो शुद्ध अंत:करण वाले एवं देह बन्धन से मुक्त हैं, वे (हम विष्णु आदि) देवता भी आपको नमस्कार ही करते हैं। ऐसे आप पुरुषोत्तम भगवान को हमारा प्रणाम है। जो श्रीराधिकाजी के हृदय को सुशोभित करने वाले चन्द्रहार हैं, गोपियों के नेत्र और जीवन के मूल आधार हैं तथा ध्वजा की भाँति गोलोकधाम को अलंकृत कर रहे हैं, आदिदेव भगवान आप संकट में पड़े हुए हम देवताओं की रक्षा करें, रक्षा करें। भगवन ! आप वृन्दावन के स्वामी हैं, गिरिराजपति भी कहलाते हैं। आप व्रज के अधिनायक हैं, गोपाल के रूप में अवतार धारण करके अनेक प्रकार की नित्य विहार-लीलाएँ करते हैं। श्रीराधिकाजी प्राणवल्ल्भ एवं श्रुतिधरों के भी आप स्वामी हैं। आप ही गोर्वधन धारी हैं, अब आप धर्म के भार को धारण करने वाली इस पृथ्वी का उद्धार करने की कृपा करें।[1]॥19-22॥ 

नारदजी कहते है- इस प्रकार स्तुति करने पर गोकुलेश्वर भगवान श्रीकृष्ण प्रणाम करते हुए देवताओं को सम्बोधित करके मेघ के समान गम्भीर वाणी में बोले-। 

श्रीकृष्ण भगवान ने कहा- ब्रह्मा, शंकर एवं (अन्य) देवताओं ! तुम सब मेरी बात सुनो। मेरे आदेशानुसार तुम लोग अपने अंशों से देवियों के साथ यदुकुल में जन्म धारण करो। मैं भी अवतार लूँगा और मेरे द्वारा पृथ्वी का भार दूर होगा। मेरा वह अवतार यदुकुल में होगा और मैं तुम्हारे सब कार्य सिद्ध करूँगा। वेद मेरी वाणी, ब्राह्मण मुख और गौ शरीर है। सभी देवता मेरे अंग हैं। साधुपुरुष तो हृदय में वास करने वाले मेरे प्राण ही हैं। अत: प्रत्येक युग में जब दम्भपूर्ण दुष्टों द्वारा इन्हें पीड़ा होती है और धर्म, यज्ञ तथा दयापर भी भी आघात पहुँचता है, तब मैं स्वयं अपने आपको भूतल पर प्रकट करता हूँ। 

श्रीनारदजी कहते हैं- जिस समय जगत्पति भगवान श्रीकृष्णचन्द्र इस प्रकार बातें कर रहे थे, उसी क्षण ‘अब प्राणनाथ से मेरा वियोग हो जायेगा’ यह समझकर श्रीराधिकाजी व्याकुल हो गयीं और दावानल से दग्ध लता की भाँति मूर्च्छित होकर गिर पड़ीं। उनके शरीर में अश्रु, कम्प, रोमांच आदि सात्त्विक भावों का उदय हो गया।

श्रीराधिकाजी ने कहा- आप पृथ्वी का भार उतारने के लिये भूमण्डल पर अवश्य पधारें; परंतु मेरी एक प्रतिज्ञा है, उसे भी सुन लें- प्राणनाथ ! आपके चले जाने पर एक क्षण भी मैं यहाँ जीवन धारण नहीं कर सकूँगी। यदि आप मेरी इस प्रतिज्ञा पर ध्यान नहीं दे रहे हैं तो मैं दुबारा भी कह रही हूँ। अब मेरे प्राण अधर तक पहुँचने को अत्यंत विह्वल हैं। ये इस शरीर से वैसे ही उड़ जायँगे, जैसे कपूर के धूलिकण।

श्रीभगवान बोले- राधिके ! तुम विषाद मत करो। मैं तुम्हारे साथ चलूँगा और पृथ्वी का भार दूर करूँगा। मेरे द्वारा तुम्हारी बात अवश्य पूर्ण होगी।

श्रीराधिकाजी ने कहा- (परंतु) प्रभो ! जहाँ वृन्दावन नहीं है, यमुना नदी नहीं है और गोवर्धन पर्वत भी नहीं है, वहाँ मेरे मन को सुख नहीं मिलता।

नारदजी कहते हैं- (श्रीराधिकाजी के इस प्रकार कहने पर) भगवान श्रीकृष्णचन्द्र ने अपने धाम से चौरासी कोस भूमि, गोवर्धन पर्वत एवं यमुना नदी को भूतल पर भेजा। उस समय सम्पूर्ण देवताओं के साथ ब्रह्माजी ने परिपूर्णतम भगवान श्रीकृष्ण को बार-बार प्रणाम करके कहा।

श्रीब्रह्माजी ने कहा- भगवन ! मेरे लिये कौन स्थान होगा ? आप कहाँ पधारेंगे ? तथा ये सम्पूर्ण देवता किन गृहों में रहेंगे और किन-किन नामों से इनकी प्रसिद्धि होगी?

श्रीभगवान ने कहा- मैं स्वयं वसुदेव और देवकी के यहाँ प्रकट होऊँगा। मेरे कला स्वरूप ये ‘शेष’ रोहिणी के गर्भ से जन्म लेंगे- इसमें संशय नहीं है। साक्षात ‘लक्ष्मी’ राजा भीष्म के घर पुत्री रूप से उत्पन्न होंगी। इनका नाम ‘रुक्मणी’ होगा और ‘पार्वती’ ‘जाम्बवती’ के नाम से प्रकट होंगी। यज्ञ पुरुष की पत्नि ‘दक्षिणा देवी’ वहाँ ‘लक्ष्मणा’ नाम धारण करेंगी। यहाँ जो ‘विरजा’ नाम की नदी है, वही ‘कालिन्दी’ नाम से विख्यात होगी। भगवती ‘लज्जा’ का नाम ‘भ्रदा’ होगा। समस्त पापों का प्रशमन करने वाली ‘गंगा’ ‘मित्रविन्दा’ नाम धारण करेगी। जो इस समय ‘कामदेव’ हैं, वे ही रुक्मणी के गर्भ से ‘प्रद्युम्न’ रूप में उत्पन्न होंगे।

प्रद्युम्न के घर तुम्हारा अवतार होगा। उस समय तुम्हें ‘अनिरूद्ध’ कहा जायेगा, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है। ये ‘वसु’ जो ‘द्रोण’ के नाम से प्रसिद्ध हैं, व्रज में ‘नन्द’ होंगे और स्वयं इनकी प्राणप्रिया ‘धरा देवी’ ‘यशोदा’ नाम धारण करेंगी। ‘सुचन्द्र’ ‘वृषभानु’ बनेंगे तथा इनकी सहधर्मिणी ‘कलावती’ धराधाम पर ‘कीर्ति’ के नाम से प्रसिद्ध होंगी। फिर उन्हीं के यहाँ इन श्रीराधिकाजी का प्राकट्य होगा। मैं व्रजमण्डल में गोपियों के साथ सदा रासविहार करूँगा।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में गोलोक खण्डा के अंतर्गत श्रीनारद बहुलाश्व संवाद में ‘भूतल पर अवतीर्ण होने के उद्योग का वर्णन’ नामक तीसरा अध्याय पूरा हुआ।

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ॐ 01.04 || नन्द आदि के लक्षण; गोपीयूथ का परिचय; श्रुति आदि के गोपीभाव की प्राप्ति में कारणभूत पूर्व प्राप्त वरदानों का विवरण

गर्ग संहिता 
गोलोक खण्ड 
अध्याय 4

नन्द आदि के लक्षण; गोपीयूथ का परिचय; श्रुति आदि के गोपीभाव की प्राप्ति में कारणभूत पूर्व प्राप्त वरदानों का विवरण

भगवान ने कहा- ब्रह्मन ! ‘सुबल’ और ‘श्रीदामा’ नाम के मेरे सखा नन्द तथा उपनन्द के घर पर जन्म धारण करेंगे। इसी प्रकार और भी मेरे सखा हैं, जिनके नाम ‘स्तोककृष्ण’, ‘अर्जुन’ एवं ‘अंशु’ आदि हैं, वे सभी नौ नन्दों के यहाँ प्रकट होंगे। व्रजमण्डल में जो छ: वृषभानु हैं, उनके गृह में विशाल, ऋषभ, तेजस्वी, देवप्रस्थ और वरूथप नाम के मेरे सखा अवतीर्ण होंगे।

श्रीब्रह्माजी ने पूछा- देवेश्वर ! किसे ‘नन्द’ कहा जाता है और किसे ‘उपनन्द’ तथा ‘वृषभानु’ के क्या लक्षण हैं?

श्रीभगवान कहते हैं- जो गोशालाओं में सदा गौंओं का पालन करते रहते हैं एवं गो-सेवा ही जिनकी जीविका है, उन्हें मैंने ‘गोपाल’ संज्ञा दी है। अब तुम उनके लक्षण सुनो। गोपालों के साथ नौ लाख गायों के स्वामी को ‘नन्द’ कहा जाता है। पाँच लाख गौओं का स्वामी ‘उपनन्द’ पद को प्राप्त करता है। ‘वृषभानु’ नाम उसका पड़ता है, जिसके अधिकार में दस लाख गौएँ रहती हैं, ऐसी ही जिसके यहाँ एक करोड़ॅ गौओं की रक्षा होती है, वह ‘नन्दराज’ कहलाता है।

पचास लाख गौओं के अध्यक्ष की ‘वृषभानुवर’ संज्ञा है। ‘सुचन्द्र’ और ‘द्रोण’- ये दो ही व्रज में इस प्रकार के सम्पूर्ण लक्षणों से सम्पन्न गोपराज बनेंगे और मेरे दिव्य व्रज में सुन्दर वस्त्र धारण करने वाली शतचन्द्रानना गोप सुन्दरियों के सौ यूथ होंगे।

श्रीब्रह्माजी ने कहा- भगवन ! आप दीनजनों के बन्धु और जगत के कारण (प्रकृति) के भी कारण हैं। प्रभो ! अब आप मेरे समक्ष यूथ के सम्पूर्ण लक्षणों का वर्णन कीजिये।

श्रीभगवान बोले- ब्रह्माजी ! मुनियों ने दस कोटि को एक ‘अर्बुद’ कहा है। जहाँ दस अर्बुद होते हैं। उसे ‘यूथ’ कहा जाता है। यहाँ की गोपियों में कुछ गोलोकवासिनी हैं, कुछ द्वारपालिका हैं, कुछ श्रृंगार साधनों की व्यवस्था करने वाली हैं और कुछ शय्या सँवारने में संलग्न रहती हैं। कई तो पार्षद कोटि में आती हैं और कुछ गोपियाँ श्रीवृन्दावन की देख-रेख किया करती हैं। कुछ गोपियों का गोर्वधन गिरि पर निवास है। कई गोपियों कुंजवन को सजाती सँवारती हैं तथा बहुतेरी गोपियाँ मेरे निकुंज में रहती हैं। इन सबको मेरे व्रज में पधारना होगा। ऐसे ही यमुना-गंगा के भी यूथ हैं। इसी प्रकार रमा, मधुमाधवी, विरजा, ललिता, विशाखा एवं माया के यूथ होंगे। ब्रह्माजी ! इसी प्रकार मेरे व्रज में आठ, सोलह और बत्तीस सखियों के भी यूथ होंगे। पूर्व के अनेक युगों में जो श्रुतियाँ, मुनियों की पत्नियाँ, अयोध्या की महिलाएँ, यज्ञ में स्थापित की हुई सीता, जनकपुर एवं कोसल देश की निवासनी सुन्दरियाँ तथा पुलिन्द कन्याएँ थीं तथा जिनको मैं पूर्ववर्ती युग-युग में वर दे चुका हूँ, वे सब मेरे पुण्यमय व्रज में गोपीरूप में पधारेंगी और उनके भी यूथ होंगे।

श्रीब्रह्माजी ने पूछा- पुरुषोत्तम ! इन स्त्रियों ने कौन-सा पुण्य-कार्य किया है तथा इन्हें कौन-कौन-से वर मिल चुके हैं, जिनके फलस्वरूप ये व्रज में निवास करेंगी ? कारण, आपका वह स्थान तो योगियों के लिये भी दुर्लभ है।

श्रीभगवान बोले- पूर्वकाल में श्रुतियों ने श्वेतद्वीप में जाकर वहाँ मेरे स्वरूपभूत भूमा (विराट पुरुष या परब्रह्म) का मधुर वाणी में स्तवन किया। तब सहस्र पाद विराट पुरुष प्रसन्न हो गये और बोले।

श्रीहरिने कहा- श्रुतियों ! तुम्हें जो भी पाने की इच्छा हो, वह वर माँग लो। जिनके ऊपर मैं स्वयं प्रसन्न हो गया, उनके लिये कौन-सी वस्तु दुर्लभ है?

श्रुतियाँ बोलीं- भगवन ! आप मन वाणी से नहीं जाने जा सकते; अत: हम आपको जानने में असमर्थ हैं। पुराणवेत्ता ज्ञानी पुरुष यहाँ जिसे केवल ‘आनन्दमात्र’ बताते हैं, अपने उसी रूप का हमें दर्शन कराइये। प्रभो ! यदि आप हमें वर देना चाहते हों तो यही दीजिये। श्रुतियों की ऐसी बात सुनकर भगवान ने उन्हें अपने दिव्य गोलोकधाम का दर्शन कराया, जो प्रकृति से परे हैं। वह लोक ज्ञानानन्दस्वरूप, अविनाशी तथा निर्विकार है। वहाँ ‘वृन्दावन’ नामक वन है, जो कामपूरक कल्पवृक्षों से सुशोभित है। मनोहर निकुंजों से सम्पन्न वह वृन्दावन सभी ऋतुओं में सुखदायी है। वहाँ सुन्दर झरनों और गुफाओं से सुशोभित ‘गोवर्धन’ नामक गिरि है। रत्न एवं धातुओं से भरा हुआ वह श्रीमान पर्वत सुन्दर पक्षियों से आवृत है।


वहाँ स्वच्छ जल वाली श्रेष्ठ नदी ‘यमुना’ भी लहराती है। उसके दोनों तट रत्नों से बँधे हैं। हंस और कमल आदि से वह सदा व्याप्त रहती है। वहाँ विविध रास-रंग से उन्मत्त गोपियों का समुदाय शोभा पाता है। उसी गोपी समुदाय के मध्य भाग में किशोर वय से सुशोभित भगवान श्रीकृष्ण विराजते हैं। उन श्रुतियों को इस प्रकार अपना लोक दिखाकर भगवान बोले-‘कहो, तुम्हारे लिये अब क्या करूँ ? तुमने मेरा यह लोक तो देख ही लिया, इससे उत्तम दूसरा कोई वर नहीं है’।

श्रुतियों ने कहा- प्रभो ! आपके करोड़ों कामदेवों के समान मनोहर श्रीविग्रह को देखकर हममें कामिनी-भाव आ गया है और हमें आपसे मिलने की उत्कट इच्छा हो रही है! हम विरह ताप संतप्त हैं-इसमें सन्देह नहीं है। अत: आपके लोक में रहने वाली गोपियाँ आपका संग पाने के लिये जैसे आपकी सेवा करती हैं, हमारी भी वैसी ही अभिलाषा है।

श्रीहरि बोले- श्रुतियों ! तुम लोगों का यह मनोरथ दुर्लभ एवं दुर्घट है; फिर भी मैं इसका भलीभाँति अनुमोदन कर चुका हूँ, अत: वह सत्य होकर रहेगा। आगे होने वाली सृष्टि में जब ब्रह्मा जगत की रचना में संलग्न होंगे, उस समय सारस्वत कल्प बीतने पर तुम सभी श्रुतियाँ व्रज में गोपियाँ होओगी। भूमण्डल पर भारतवर्ष में मेरे माथुर मण्डसल के अंतर्गत वृन्दावन में रास मण्ड ल के भीतर मैं तुम्हारा प्रियतम बनूँगा। तुम्हारा मेरे प्रति सुदृढ़ प्रेम होगा, जो सब प्रेमों से बढ़कर है। तब तुम सब श्रुतियाँ मुझे पाकर सफल-मनोरथ होओगी।

श्रीभगवान कहते हैं- ब्रह्माजी ! पूर्व कल्प मैंने वर दे दिया है, उसी के प्रभाव से वे श्रुतियाँ व्रज में गोपियाँ होंगी। अब अन्य गोपियों के लक्षण सुनो। त्रेतायुग में देवताओं की रक्षा और राक्षसों का संहार करने के लिये मेरे स्वरूपभूत महापराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी अवतीर्ण हुए थे। कमल लोचन श्रीराम ने सीता के स्वयंवर में जाकर धनुष तोड़ा और उन जनकनन्दिनी श्रीसीताजी के साथ विवाह किया। ब्रह्माजी ! उस अवसर पर जनकपुर की स्त्रियाँ श्रीराम को देखकर प्रेमविह्वल हो गयीं।

उन्होंने एकांत में उन महाभाग से अपना अभिप्राय प्रकट किया- ‘राघव ! आप हमारे परम प्रियतम बन जायँ।’ तब श्रीराम ने कहा ‘सुन्दरियों ! तुम शोक मत करो। द्वापर के अंत में मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगा। तुम लोग परम श्रद्धा और भक्ति के साथ तीर्थ, दान, तप, शौच एवं सदाचार का भलीभाँति पालन करती रहो। तुम्हें व्रज में गोपी होने का सुअवसर प्राप्त होगा।’ इस प्रकार वर देकर धनुर्धारी करूणानिधि श्रीराम ने अयोध्या के लिये प्रस्थान कर दिया। उस समय मार्ग में अपने प्रताप से उन्होंने भृगुकुल नन्दन परशुरामजी को परास्त कर दिया था। कोसल-जनपद की स्त्रियों ने भी राजपथ से जाते हुए उन कमनीय कांति राम को देखा। उनकी सुन्दरता कामदेव को मोहित कर रही थी। उन स्त्रियों ने श्रीराम को मन ही मन पति के रूप में वरण कर लिया। उस समय सर्वज्ञ श्रीराम ने उन समस्त स्त्रियों को मन ही मन वर दिया- ‘तुम सभी व्रज में गोपियाँ होओगी और उस समय मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगा। फिर सीता और सैनिकों के साथ रघुनाथजी अयोध्या पधारे। यह सुनकर अयोध्या में रहने वाली स्त्रियाँ उन्हें देखने के लिये आयीं। श्रीराम को देखकर उनका मन मुग्ध हो गया। वे प्रेम से विह्वल हो मूर्च्छित-सी हो गयीं। फिर वे श्रीराम के व्रत में परायण होकर सरयू के तट पर तपस्या करने लगीं। तब उनके सामने आकाशवाणी हुई- ‘द्वापर के अंत में यमुना के किनारे वृन्दावन में तुम्हारे पूर्ण होंगे, इसमें सन्देह नहीं है। जिस समय श्रीराम ने पिता की आज्ञा से दण्डक वन की यात्रा की, सीता तथा लक्ष्मण भी उनके साथ थे और वे हाथ में धनुष लेकर इधर-उधर विचर रहे थे। वहीं बहुत-से मुनि थे। उनकी गोपाल-वेषधारी भगवान के स्वरूप में निष्ठा थी। रासलीला के निमित्त वे भगवान का ध्यान करते थे। उस समय श्रीराम की युवा अवस्था थी-वे हाथ में धनुष-बाण धारण किये हुये थे। जटाओं के मुकुट से उनकी विचित्र शोभा थी। अपने आश्रम पर पधारे हुए श्रीराम में उन मुनियों का ध्यान लग गया। (वे ऋषि लोग गोपाल-वेषधारी भगवान के उपासक थे) अत: दूसरे ही स्वरूप में आये हुए श्रीराम को देखकर सबके मन में अत्यंत आश्चर्य हो गया।
उनकी समाधि टूट गयी और देखा तो करोड़ों कामदेवों के समान सुन्दर श्रीराम दृष्टिगोचर हुए। 

तब वे बोल उठे- ‘अहो ! आज हमारे गोपालजी वंशी एवं बेंत के बिना ही पधारे हैं।’- इस प्रकार मन ही मन विचार कर सबने श्रीराम को प्रणाम किया और उनकी उत्तम स्तुति करने लगे। 

तब श्रीराम ने कहा- ‘मुनियों ! वर माँगो।’ यह सुनकर सभी ने एक स्वर से कहा- ‘जिस भाँति सीता आपके प्रेम को प्राप्त हैं, वैसे ही हम भी चाहते हैं’। श्रीराम बोले- यदि तुम्हारी ऐसी प्रार्थना हो कि जैसे भाई लक्ष्मण हैं, वैसे ही हम भी आपके भाई बन जायँ, तब तो आज ही मेरे द्वारा तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण हो सकती है; किंतु तुमने तो ‘सीता’ के समान होने का वर माँगा है। अत: यह वर महान कठिन और दुर्लभ है; क्योंकि इस समय मैंने एक पत्नि-व्रत धारण कर रखा है। मैं मर्यादा की रक्षा में तत्पर रहकर ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ भी कहलाता हूँ। अतएव तुम्हें मेरे वर का आदर करके द्वापर के अंत में जन्म धारण करना होगा और वहीं मैं तुम्हारे इस उत्तम मनोरथ को पूर्ण करूँगा। इस प्रकार वर देकर श्रीराम स्वयं पंचवटी पधारे। वहाँ पर्णकुटि में रहकर वनवास की अवधि पूरी करने लगे। उस समय भीलों की स्त्रियों ने उन्हें देखा। उनमें मिलने की उत्कट इच्छा उत्पन्न होने के कारण वे प्रेम से विह्वल हो गयीं। यहाँ तक कि श्रीराम के चरणों धूल मस्तक पर रखकर अपने प्राण छोड़ने की तैयारी करने लगीं। उस समय श्रीराम ब्रह्मचारी के वेष में वहाँ आये और इस प्रकार बोले-‘स्त्रियो ! तुम व्यर्थ ही प्राण त्यागना चाहती हो; ऐसा मत करो। द्वापर के शेष होने पर वृन्दावन में तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा।’ इस प्रकार का आदेश देकर श्रीराम का वह ब्रह्मचारी रूप वहीं अंतर्हित हो गया। तत्पश्चात् श्रीराम ने सुग्रीव आदि प्रधान वानरों की सहायता से लंका में जाकर रावण प्रभृति राक्षसों को परास्त किया। फिर सीता को पाकर पुष्पक विमान द्वारा अयोध्या चले गये। राजाधिराज श्रीराम ने लोकापवाद के कारण सीता को वन में छोड़ दिया।

अहो ! भूमण्ड ल पर दुर्जनों का होना बहुत ही दु:खदायी है। जब-जब कमललोचन श्रीराम यज्ञ करते थे, तब-तब विधिपूर्वक सुवर्णमयी सीता की प्रतिमा बनायी जाती थी। इसलिये श्रीराम-भवन में यज्ञ-सीताओं का एक समूह ही एकत्र हो गया। वे सभी दिव्य चैतन्य-घनस्वरूपा होकर श्रीराम के पास गयीं। उस समय श्रीराम ने उनसे कहा- ‘प्रियाओं ! मैं तुम्हें स्वीकार नहीं कर सकता।’ वे सभी प्रेम परायणा सीता-मूर्तियाँ दशरथ नन्दन श्रीराम से कहने लगीं- ‘ऐसा क्यों ? हम तो आपकी सेवा करने वाली हैं। हमारा नाम भी मिथिलेश कुमारी सीता है और हम उत्तम व्रत का आचरण करने वाली सतियाँ भी हैं; फिर हमें आप ग्रहण क्यों नहीं करते ? यज्ञ करते समय हम आपकी अर्धांगिनी बनकर निरंतर कार्यों का संचालन करती रही हैं। आप धर्मात्मा और वेद के मार्ग का अवलम्बन करने वाले हैं, यह अधर्मपूर्ण बात आपके श्रीमुख से कैसे निकल रही है ? यदि आप स्त्री का हाथ पकड़-कर उसे त्यागते हैं तो आपको पाप का भागी होना पड़ेगा। 

श्रीराम बोले- सतियों ! तुमने मुझसे जो बात कही है, वह बहुत ही उचित और सत्य है। परंतु मैंने ‘एकपत्निव्रत’ धारण कर रखा है ? सभी लोग मुझे ‘राजर्षि’ कहते हैं। अत: नियम को छोड़ भी नहीं सकता। एकमात्र सीता ही मेरी सहधर्मिणी है। इसलिये तुम सभी द्वापर के अंत में श्रेष्ठ वृन्दावन में पधारना, वहीं तुम्हारी मन:कामना पूर्ण करूँगा। 

भगवान श्रीहरि ने कहा- ब्रह्मन ! वे यज्ञ-सीता ही व्रज में गोपियाँ होंगी। अन्य गोपियों का भी लक्षण सुनो। इस प्रकार श्रीगर्गसंहिता में गोलोक खण्डन के अंतर्गत भगवद ब्रह्म संवाद में ‘अवतार के उद्योग विषयक प्रश्न का वर्णन’ नामक चौथा अध्याय पूरा हुआ।



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