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ॐ 001.01 || नारद- बहुलाश्व् संवाद में ‘श्रीकृष्णम माहातमय का वर्णन’। नारद जी के द्वारा अवतार-भेद का निरूपण….

ॐ 01.01 || नारद- बहुलाश्व् संवाद में ‘श्रीकृष्णम माहातमय का वर्णन’। नारद जी के द्वारा अवतार-भेद का निरूपण….

गर्ग संहिता - 01 || गोलोक खण्ड || अध्याय 01


 गर्ग संहिता यदुवंशियों के आचार्य गर्ग मुनि की रचना है।


इस संहिता में मधुर श्रीकृष्णलीला परिपूर्ण है तथा इसमें

राधाजी की माधुर्य-भाव वाली लीलाओं का वर्णन है।

श्रीमद्भगवद्गीता में जो कुछ सूत्ररूप से कहा गया है, गर्ग-संहिता में उसी का बखान किया गया है,अतः यह भागवतोक्त श्रीकृष्णलीला का महाभाष्य है।

“गर्ग संहिता” गोलोक खण्ड : अध्याय 1

01- नारद- बहुलाश्व् संवाद में ‘श्रीकृष्णम माहातम्य का वर्णन’। नारद जी के द्वारा अवतार-भेद का निरूपण….

नारायणं नमस्‍कृत्‍य नरं चैव नरोत्तमम्। देवीं सरस्‍वतीं व्‍यासं ततो जयमुदीरयेत्।। शरद्विकचपंकजश्रियमतीवविद्वेषकं मिलिन्‍दमुनिसेवितं कुलिशकंजचिह्नावृतम्। स्‍फुरत्‍कनकनूपुरं दलितभक्ततापत्रयं चलद्द्युतिपदद्वयं हृदि दधामि राधापते:।। वदनकमलनिर्यद् यस्‍य पीयूषमाद्यं पिबति जनवरोऽयं पातु सोऽयं गिरं मे। बदरवनविहार: सत्‍यवत्‍या: कुमार: प्रणतदुरितहार: शार्ङगधन्‍वावतार:।।

‘भगवान नारायण, नरश्रेष्ठ नर, देवी सरस्वती तथा महर्षि व्यास को नमस्कार करने के पश्चात जय (श्रीहरि की विजय गाथा से पूर्ण इतिहास पुराण) का उच्चारण करना चाहिये।

मैं भगवान श्रीराधाकांत के उन युगल चरण कमलों को अपने हृदय में धारण करती/करता हूँ, जो शरद ऋतु के प्रफुल्लित कमलों की शोभा को अत्यंत नीचा दिखाने वाले हैं, मुनिरूपी भ्रमरों के द्वारा जिनका निरंतर सेवन होता रहता है, जो वज्र और कमल आदि के चिन्हों से विभूषित हैं, जिनमें सोने के नूपुर चमक रहे हैं और जिन्होंने भक्तों के त्रिविध ताप का सदा ही नाश किया तथा जिनसे दिव्य ज्योति छिटक रही है।

जिनके मुख कमल से निकली हुई आदि कथारूपी सुधा का बड़भागी मनुष्य सदा पान करता रहता है, वे बदरीवन में विहार करने वाले, प्रणतजनों का ताप हरने में समर्थ, भगवान विष्णु के अवतार सत्यवती कुमार श्रीव्यासजी मेरी वाणी की रक्षा करें- उसे दोषमुक्त करें’।

एक समय की बात है, ज्ञानि शिरोमणि परम तेजस्वी मुनिवर गर्गजी, जो योगशास्त्र के सूर्य हैं, शौनकजी से मिलने के लिये नैमिषारण्य में आये।

उन्हें आया देख मुनियों सहित शौनकजी सहसा उठकर खड़े हो गये और उन्होंने पाद्य आदि उपचारों से विधिवत उनकी पूजा की।

शौनकजी ने कहा:- साधु पुरुषों का सब ओर निचरण धन्य है; क्योंकि वह गृहस्थ-जनों को शांति प्रदान करने का हेतु कहा गया है।

मनुष्यों के भीतरी अन्धकार का नाश महात्मा ही करते हैं, न कि सूर्य।

भगवान, मेरे मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न हुई है कि भगवान के अवतार कितने प्रकार के हैं, आप कृपया इसका निवारण कीजिये।

श्रीगर्गजी कहते हैं:- ब्रह्मन, भगवान के गुणानुवाद से सम्बन्ध रखने वाला आपका यह प्रश्न बहुत ही उत्तम है।

यह कहने, सुनने और पूछने वाले- तीनों के कल्याण का विस्तार करने वाला है।

इसी प्रसंग में एक प्राचीन इतिहास का कथन किया जाता है, जिसके श्रवण मात्र से बड़े-बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं।

पहले की बात है, मिथिलापुरी में बहुलाश्व नाम से विख्यात एक प्रतापी राजा राज्य करते थे।

वे भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त, शांतचित्त एवं  अहंकार से रहित थे।

एक दिन मुनिवर नारद जी आकाश मार्ग से उतरकर उनके यहाँ पधारे।

उन्हें उपस्थित देखकर राजा ने आसन पर बिठाया और भलीभाँति उनकी पूजा करके हाथ जोड़कर उनसे इस प्रकार पूछा।

राजा बहुलाश्व बोले:- महामते, जो भगवान अनादि, प्रकृति से परे और सबके अंतर्यामी ही नहीं, आत्मा हैं, वे शरीर कैसे धारण करते हैं?

(जो सर्वत्र व्यापक है, वह शरीर से परिच्छिन्न कैसे हो सकता है?) यह मुझे बताने की कृपा करें।

नारदजी ने कहा:- गौ, साधु, देवता, ब्राह्मण और वेदों की रक्षा के लिये साक्षात भगवान श्रीहरि अपनी लीला से शरीर धारण करते हैं।

[अपनी अचिंत्य लीलाशक्ति से ही वे देहधारी होकर भी व्यापक बने रहते हैं, उनका वह शरीर प्राकृत नहीं, चिन्मय है।]

जैसे नट अपनी माया से मोहित नहीं होता और दूसरे लोग मोह में पड़ जाते हैं, वैसे ही अन्य प्राणी भगवान की माया देखकर मोहित हो जाते हैं, किंतु परमात्मा मोह से परे रहते हैं- इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है।

राजा बहुलाश्व ने पूछा:- मुनिवर, संतों की रक्षा के लिये भगवान विष्णु के कितने प्रकार के अवतार होते हैं, यह मुझे बताने की कृपा करें।

श्रीनारदजी बोले:- राजन, व्यास आदि मुनियों ने अंशांश, अंश, आवेश, कला, पूर्ण और परिपूर्णतम- ये छ: प्रकार के अवतार बताये हैं।

इनमें से छठा परिपूर्णतम अवतार साक्षात श्रीकृष्ण ही हैं।

मरीचि आदि “अंशांशावतार”, ब्रह्मा आदि ‘अंशावतार’, कपिल एवं कूर्म प्रभृति ‘कलावतार’ और परशुराम आदि ‘आवेशावतार’ कहे गये हैं।

नृसिंह, श्रीराम, श्वेतद्वीपाधिपति हरि, वैकुण्ठ, यज्ञ और नर नारायण- ये ‘पूर्णावतार’ हैं एवं साक्षात भगवान श्रीकृष्ण ही ‘परिपूर्णतम’ अवतार हैं।

अंसख्य ब्रह्माण्डों के अधिपति वे प्रभु गोलोकधाम में विराजते हैं।

जो भगवान के दिये सृष्टि आदि कार्यमात्र के अधिकार का पालन करते हैं, वे ब्रह्मा आदि ‘सत’ (सत्स्वरूप भगवान) के अंश हैं।

जो उन अंशों के कार्यभार में हाथ बटाते हैं, वे ‘अंशांशावतार’ के नाम से विख्यात हैं।

परम बुद्धिमान नरेश, भगवान विष्णु स्वयं जिनके अंत:करण में आविष्ट हो, अभीष्ट कार्य का सम्पादन करके फिर अलग हो जाते हैं, राजन, ऐसे नानाविध अवतारों को ‘आवेशावतार’ समझो।

जो प्रत्येक युग में प्रकट हो, युगधर्म को जानकर, उसकी स्थापना करके, पुन: अंतर्धान हो जाते हैं, भगवान के उन अवतारों को ‘कलावतार’ कहा गया है।

जहाँ चार व्यूह प्रकट हों- जैसे श्रीराम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न एवं वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरूद्ध, तथा जहाँ नौ रसों की अभिव्यक्ति देखी जाती हो एवं जहाँ बल-पराक्रम की भी पराकाष्ठा दृष्टिगोचर होती हो, भगवान के उस अवतार को ‘पूर्णावतार’ कहा गया है।

जिसके अपने तेज में अन्य सम्पूर्ण तेज विलीन हो जाते हैं, भगवान के उस अवतार को श्रेष्ठ विद्वान पुरुष साक्षात ‘परिपूर्णम’ बताते हैं।

जिस अवतार में पूर्ण का पूर्ण लक्षण दृष्टिगोचर होता है और मनुष्य जिसे पृथक-पृथक भाव के अनुसार अपने परम प्रिय रूप में देखते हैं, वही यह साक्षात ‘परिपूर्णतम’ अवतार है।

इन सभी लक्षणों से सम्पन्न स्वयं परिपूर्णतम भगवान श्रीकृष्ण ही हैं, दूसरा नहीं; क्योंकि श्रीकृष्ण ने एक कार्य के उद्देश्य से अवतार लेकर अन्यान्य करोड़ों कार्यों का सम्पादन किया है।

जो पूर्ण, पुराण पुरुषोत्तमोत्तम एवं परात्पर पुरुष परमेश्वर हैं, उन साक्षात सदानन्दमय, कृपानिधि, गुणों के आकार भगवान श्रीकृष्ण चन्द्र की मैं शरण लेता हूँ।

यह सुनकर राजा हर्ष भर गये, उनके शरीर में रोमांच हो आया।

वे प्रेम से विह्वल हो गये और अश्रुपूर्ण नेत्रों को पोंछकर नारदजी से यों बोले।

राजा बहुलाश्व ने पूछा:- महर्षे, साक्षात परिपूर्णतम भगवान श्रीकृष्णचन्द्र सर्वव्यापी चिन्मय गोलोकधाम से उतरकर जो भारत वर्ष के अंतर्गत द्वारकापुरी में विराज रहे हैं- इसका क्या कारण है?

ब्रह्मन, उन भगवान श्रीकृष्ण के सुन्दर बृहत (विशाल या ब्रह्म स्वरूप) गोलोकधाम का वर्णन कीजिये।

महामुने, साथ ही उनके अपरिमेय कार्यों को भी कहने की कृपा कीजिये।

मनुष्य जब तीर्थ यात्रा तथा सौ जन्मों तक उत्तम तपस्या करके उसके फलस्वरूप सत्संग का सुअवसर पाता है, तब वह भगवान श्रीकृष्णचन्द्र को शीघ्र प्राप्त कर लेता है।

कब मैं भक्ति रस से आर्द्रचित्त हो मन से भगवान श्रीकृष्ण के दास का भी दासानुदास होऊँगा?

जो सम्पूर्ण देवताओं के लिये भी दुर्लभ हैं, वे परब्रह्म परमात्मा आदिदेव भगवान श्रीकृष्ण मेरे नेत्रों के समक्ष कैसे होंगे?

श्रीनारद जी बोले:- नृपश्रेष्ठ तुम धन्य हो, भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के अभीष्ट जन हो और उन श्रीहरि के परम प्रिय भक्त हो।

तुम्हें दर्शन देने के लिये ही वे भक्त वत्सल भगवान यहाँ अवश्य पधारेंगे।

ब्रह्मण्यदेव भगवान जनार्दन द्वारका में रहते हुए भी तुम्हें और ब्राह्मण श्रुतदेव को याद करते रहते हैं, अहो, इस लोक में संतों का कैसा सौभाग्य है।

(इस प्रकार श्री गर्ग संहिता में गोलोक खण्ड के अन्तदर्गत नारद- बहुलाश्व् संवाद में ‘श्रीकृष्णम माहातमय का वर्णन’ नामक पहला अध्याय पूरा हुआ।) ।।1।।



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